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बाड़मेरत्न राजयोग के नियमित अभ्यास से ही मन की स्थिरता संभव है। यह बात प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने महावीर नगर स्थित केंद्र में ‘राजयोग का जीवन में महत्व’ विषय पर कहे। उन्होंने कहा कि जीवन में शांति, स्थिरता और खुशी के लिए जीवन में स्थिरता, स्वस्थ जीवन शैली, सकारात्मक चिंतन, साक्षी दृष्टा और आत्मा निर्भयता की आवश्यकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन विकारों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति राजयोग से प्राप्त होती है। राजयोग हमें सकारात्मक चिंतन करने की कला सिखाता है। उन्होंने कहा कि राजयोग से हम अपने शरीर को वश में कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सकारात्मक सोच से ही शरीर की बीमारियों से मुक्ति पाना संभव है। स्थानीय ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की बबीता बहन ने कहा कि राजयोग के निरंतर अभ्यास से हम अपने कर्मेंद्रियों को संयमित कर सकते हैं।

चिंतन तनाव का कारण : भगवान भाई

भास्कर न्यूज त्न बाड़मेर

दूसरों की कमियों को देखना, उसी के बारे में सोचना यह आदत हानिकारक है। पर चिंतन पतन की ओर ले जाता है। जो पर चिंतन करता है वह जीवन में कभी भी सुखी नहीं रह सकता। यह बात प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्मा कुमार भगवान भाई ने सेवा केंद्र में कही। स्व चिंतन विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा पर चिंतन करने वाला व दूसरों को देखने वाला हमेशा तनाव में रहता है। पर चिंतन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उन्होंने कहा हम अपनी आंतरिक कमजोरियों की जांच कर उसका परिवर्तन कर सकते हैं। स्व चिंतन ही उन्नति की सीढ़ी है। भगवान भाई ने कहा हमारा जीवन हंस की तरह अंदर-बाहर स्वच्छ रखने की जरूरत है। गुणवान व्यक्ति ही समाज व देश की असली संपत्ति है। उन्होंने कहा सहनशीलता के आचरण से ही व्यक्ति महानता को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की बी.के सिंधु बहन ने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान की सकारात्मक बातों का चिंतन करने से हम आंतरिक शक्तियों को जागृत कर अपना आत्मबल, मनोबल बढ़ा सकते हैं।

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February 14, 2012

 

आंतरिक चेतना के विकास को महत्व देना जरूरी
भास्कर न्यूजत्न बाड़मेर
समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा, चिंता का कारण बन रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए। 

ये विचार प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की भारत में संचालित हो रही स्कूलों में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने व्यक्त किए। शुक्रवार को उन्होंने एक कार्यक्रम के तहत राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक स्कूल की छात्राओं को नैतिक शिक्षा का महत्व बताया । राजयोगी भगवान भाई ने कहा कि आज समाज, देश एवं विश्व की क्या स्थिति है। इस बारे में हम अच्छी तरह जानते हैं। केवल भौगोलिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते हैं, वरिष्ठ राजयोगी ने कहा हमारी विरासत हमारे मूल्य है। मूल्य की संस्कृति के कारण आज भारत की पहचान पूरे विश्व में की जाती है। भगवानभाई ने कहा बच्चों को सच्चा और मूल्यनिष्ठ बनाने का ध्यान रखना चाहिए। ब्रह्मकुमारी राजयोग केंद्र की बी.के दमा ने कहा कि जीवन में नैतिक मूल्य एवं चरित्र का आधार आध्यात्मिकता है। कांता चौधरी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा वर्तमान में बच्चों को संस्कारित करने के साथ नैतिक शिक्षा जरूरी है।

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नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव स्कूली छात्रों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व बताया जैसलमेर .बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ- साथ नैतिक शिक्षा की भी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा से ही सर्वांगीण विकास संभव है। यह उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रामावि सुथार पाड़ा के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना ही आज की आवश्यकता है। वर्तमान में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है, जो व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। ज्ञान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जो शिक्षा विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाए वही सच्ची शिक्षा है। उन्होंने बताया कि समाज अमूर्त है और वह प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों से ही संचालित होता है। राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि शिक्षा एक ऐसा बीज है जिससे जीवन फलदार वृक्ष बन जाता है। जब तक व्यवहारिक जीवन में सेवाभाव, परोपकार, धैर्य, त्याग, उदारता, नम्रता, सहनशीलता, सत्यता, पवित्रता आदि सद्गुण रूपी फल नहीं आते तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे कल का भावी समाज है। अगर कल के समाज को बेहतर समाज देखना चाहते हो तो वर्तमान के छात्र- छात्राओं को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें संस्कारित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अच्छा या बुरा उसके अंदर के गुणों से बनता है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी केन्द्र के बी.के. देवपुरी ने कहा कि चरित्रवान, गुणवान बच्चे देश व समाज की संपति है। प्रधानाचार्य सुरेशचंद्र पालीवाल ने कहा कि मूल्य शिक्षा से ही व्यक्ति महान बन सकता है। शारीरिक शिक्षक अमृतलाल ने कार्यक्रम का संचालन किया। इसी कड़ी में नैतिक मूल्यों पर आधारित व्याख्यान स्वामी विवेकानंद उच्च माध्यमिक विद्यालय में भी दिया गया।

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February 14, 2012

 

नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव
स्कूली छात्रों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व बताया
जैसलमेर .बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ- साथ नैतिक शिक्षा की भी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा से ही सर्वांगीण विकास संभव है। यह उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रामावि सुथार पाड़ा के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना ही आज की आवश्यकता है। वर्तमान में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है, जो व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। ज्ञान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जो शिक्षा विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाए वही सच्ची शिक्षा है। उन्होंने बताया कि समाज अमूर्त है और वह प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों से ही संचालित होता है। 

राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि शिक्षा एक ऐसा बीज है जिससे जीवन फलदार वृक्ष बन जाता है। जब तक व्यवहारिक जीवन में सेवाभाव, परोपकार, धैर्य, त्याग, उदारता, नम्रता, सहनशीलता, सत्यता, पवित्रता आदि सद्गुण रूपी फल नहीं आते तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे कल का भावी समाज है। अगर कल के समाज को बेहतर समाज देखना चाहते हो तो वर्तमान के छात्र- छात्राओं को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें संस्कारित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अच्छा या बुरा उसके अंदर के गुणों से बनता है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी केन्द्र के बी.के. देवपुरी ने कहा कि चरित्रवान, गुणवान बच्चे देश व समाज की संपति है। प्रधानाचार्य सुरेशचंद्र पालीवाल ने कहा कि मूल्य शिक्षा से ही व्यक्ति महान बन सकता है। शारीरिक शिक्षक अमृतलाल ने कार्यक्रम का संचालन किया। इसी कड़ी में नैतिक मूल्यों पर आधारित व्याख्यान स्वामी विवेकानंद उच्च माध्यमिक विद्यालय में भी दिया गया।

 

 

जैसलमेर. रामावि सुथारपाड़ा में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते प्रजापति ब्रह्माकुमारी के प्रतिनिधि।

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कलियुग अभी बच्चा नहीं है बल्कि बुढ़ा हो गया है इसका विनाश निकट है और शीघ्र ही सतयुग आने वाला है I

 कलियुग अभी बच्चा नहीं है बल्कि बुढ़ा हो गया है 

इसका विनाश निकट है  और शीघ्र ही सतयुग आने वाला है I

आज बहुत  से लोग कहते है , ” कलियुग अभी बच्चा है अभी तो इसके लाखो वर्ष और रहते है शस्त्रों के अनुसार अभी तो सृष्टि के महाविनाश में बहुत काल रहता है I  “

परन्तु अब परमपिता परमात्मा कहते है की अब तो कलियुग बुढ़ा हो चूका है I अब तो सृष्टि के महाविनाश की घडी निकट आ पहुंची है I अब सभी देख भी रहे है की यह मनुष्य सृष्टि काम, क्रोध,लोभ,मोह तथा अहंकार की चिता पर जल रही है I सृष्टि के महाविनाश के लिए एटम  बम, हाइड्रोजन  बम तथा मुसल भी बन चुके है I अत: अब भी यदि कोई कहता है कि महाविनाश दूर है, तो वह घोर अज्ञान में है और कुम्भकर्णी निंद्रा में सोया हुआ है, वह अपना अकल्याण कर रहा है I अब जबकि परमपिता परमात्मा शिव अवतरित होकर ज्ञान अमृत पिला रहे है, तो वे लोग उनसे वंचित है I

आज तो वैज्ञानिक एवं विद्याओं के विशेषज्ञ भी कहते है कि जनसँख्या जिस तीव्र गति से बढ रही है, अन्न की उपज इस अनुपात से नहीं बढ रही है I इसलिए  वे अत्यंत भयंकर अकाल के परिणामस्वरूप महाविनाश कि घोषणा करते है I पुनश्च, वातावरण प्रदुषण तथा पेट्रोल, कोयला इत्यादि शक्ति स्त्रोतों के कुछ वर्षो में ख़त्म हो जाने कि घोषणा भी वैज्ञानिक कर रहे है I अन्य लोग पृथ्वी के ठन्डे होते जाने होने के कारण हिम-पात कि बात बता रहे है I आज केवल रूस और अमेरिका के पास ही लाखो तन बमों जितने आणविक शस्त्र है I इसके अतिरिक्त, आज का जीवन ऐसा विकारी एवं तनावपूर्ण हो गया है कि अभी करोडो वर्ष तक कलियुग को मन्ना तो इन सभी बातो की ओर आंखे मूंदना ही है परन्तु सभी को याद रहे कि परमात्मा अधर्म के महाविनाश से ही देवी  धर्म की पुन: सथापना  भी कराते है I

अत: सभी को मालूम होना चाहिए कि अब परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव सतयुगी पावन एवं देवी सृष्टि कि पुन: स्थापना करा रहे है I वे मनुष्य को देवता अथवा पतितो को पावन बना रहे है I अत: अब उन द्वारा सहज राजयोग तथा ज्ञान- यह अनमोल विद्या सीखकर जीवन को पावन, सतोप्रधन देवी, तथा आन्नदमय बनाने का सर्वोत्तम पुरुषार्थ करना चाहिए जो लोग यह समझ बैठे है कि अभी तो कलियुग में लाखो वर्ष शेष है, वे अपने ही सौभाग्य को लौटा रहे है!

अब कलियुगी सृष्टि अंतिम श्वास ले रही है, यह मृत्यु-शैया पर है यह काम, क्रोध लोभ, मोह और अहंकार रोगों द्वारा पीड़ित है I अत: इस सृष्टि की आयु अरबो वर्ष मानना भूल है I और कलियुग को अब बच्चा मानकर अज्ञान-निंद्रा में सोने वाले लीग “कुम्भकरण” है I  जो मनुष्य इस ईश्वरीय  सन्देश को एक कण से सुनकर दुसरे कण से निकल देते है उन्ही के कान ऐसे कुम्भ के समान है, क्योंकि कुम्भ बुद्धि-हीन होता है I

सृष्टि नाटक का रचयिता और निर्देशक कौन है यह मनुष्य सृष्टि पृकृति-पुरुष का एक अनादी खेल है इसकी कहानी को जानकर मनुष्यात्मा बहुत ही आन्नद प्राप्त कर सकती है I सृष्टि रूपी नाटक के चार पट सामने दिए गए चित्र में दिखाया गया है कि स्वस्तिक सृष्टि- चक्र को चार बराबर भागो में बांटता है — सतयुग,त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग I

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February 4, 2012

सृष्टि नाटक का रचयिता और निर्देशक कौन है यह मनुष्य सृष्टि पृकृति-पुरुष का एक अनादी खेल है इसकी कहानी को जानकर मनुष्यात्मा बहुत ही आन्नद प्राप्त कर सकती है I सृष्टि रूपी नाटक के चार पट सामने दिए गए चित्र में दिखाया गया है कि स्वस्तिक सृष्टि- चक्र को चार बराबर भागो में बांटता है — सतयुग,त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग I

 सृष्टि नाटक का रचयिता और निर्देशक कौन है
यह मनुष्य सृष्टि पृकृति-पुरुष का एक अनादी खेल है इसकी कहानी को जानकर मनुष्यात्मा बहुत ही आन्नद प्राप्त कर सकती है I
सृष्टि रूपी नाटक के चार पट
सामने दिए गए चित्र में दिखाया गया है कि स्वस्तिक सृष्टि- चक्र को चार बराबर भागो में बांटता है — सतयुग,त्रेतायुग , द्वापर और कलियुग I
सृष्टि नाटक में हर एक आत्मा का एक निश्चित समय पर परमधाम से इस सृष्टि रूपी नाटक के मंच पर आती है I सबसे पहले सतयुग और त्रेतायुग के सुन्दर दृश्य सामने आते है I और इन दो युगों की सम्पूर्ण सुखपूर्ण सृष्टि में पृथ्वी-मंच पर एक “अदि सनातन देवी देवता धर्म वंश” की ही मनुष्यात्माओ का पार्ट होता है I और अन्य सभी धर्म-वंशो की आत्माए परमधाम में होती है I अत: इन दो युगों में केवल इन्ही दो वंशो की ही मनुष्यात्माये अपनी-अपनी पवित्रता की स्तागे के अनुसार नम्बरवार आती है इसलिए, इन दो युगों में सभी अद्वेत पुर निर्वैर स्वभाव वाले होते है I
द्वापरयुग में इसी धर्म की रजोगुणी अवस्था हो जाने से इब्राहीम द्वारा इस्लाम धर्म-वंश की, बुद्ध द्वारा बौद्ध-धर्म वंश की और ईसा द्वारा ईसाई धर्म की स्थापना होती है I अत: इन चार मुख्य धर्म वंशो के पिता ही संसार के मुख्य एक्टर्स  है और इन चार धर्म के शास्त्र ही मुख्य शास्त्र है इसके अतिरिक्त, सन्यास धर्म के स्थापक नानक भी इस विश्व नाटक के मुख्य एक्टरो में से है I परन्तु फिर भी मुख्य रूप में पहले बताये गए चार धर्मो पर ही सारा विश्व नाटक आधारित है इस अनेक मत-मतान्तरो के कारण द्वापर युग तथा कलियुग की सृष्टि में द्वेत, लड़ाई झगडा तथा दुःख होता है I
कलियुग के अंत में, जब धर्म की आती ग्लानी हो जाती है, अर्थात विश्व का सबसे पहला ” अदि सनातन देवी देवता धर्म” बहुत क्षीण हो जाता है और मनुष्य अत्यंत पतित हो जाते है, तब इस सृष्टि के रचयिता तथा निर्देशक परमपिता परमात्मा शिव प्रजापिता ब्रह्मा के तन में स्वयं अवतरित होते है I वे प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा मुख-वंशी  कन्या –” ब्रह्माकुमारी सरस्वती ” तथा अन्य ब्राह्मणों तथा ब्रह्मानियो को रचते है और उन द्वारा पुन: सभी को अलौकिक माता-पिता के रूप में मिलते है तथा ज्ञान द्वारा उनकी मार्ग-प्रदर्शना करते है और उन्हें मुक्ति तथा जीवनमुक्ति का ईश्वरीय जन्म-सिद्ध अधिकार देते है I अत: प्रजपिता बह्मा तथा जगदम्बा सरस्वती, जिन्हें ही “एडम”  अथवा “इव” अथवा “आदम और हव्वा” भी कहा जाता है इस सृष्टि नाटक के नायक और नायिका है I क्योंकि इन्ही द्वारा स्वयं परमपिता परमात्मा शिव पृथ्वी पर स्वर्ग स्थापन करते है कलियुग के अंत और सतयुग के आरंभ का यह छोटा सा संगम, अर्थात संगमयुग, जब परमात्मा अवतरित होते है, बहुत ही महत्वपूर्ण है I
विश्व के इतिहास और भूगोल की पुनरावृत्ति
चित्र में यह भी दिखाया गया है कि कलियुग के अंत में परमपिता परमात्मा शिव जब महादेव शंकर के द्वारा सृष्टि का महाविनाश करते है तब लगभग सभी आत्मा रूपी एक्टर अपने प्यारे देश, अर्थात मुक्तिधाम को वापस लौट जाते है और फिर सतयुग के आरंभ से “अदि सनातन देवी देवता धर्म” कि मुख्य मनुष्यात्माये इस सृष्टि-मंच पर आना शुरू कर देती है I फिर २५०० वर्ष के बाद, द्वापरयुग के प्रारंभ से इब्राहीम के इस्लाम घराने की आत्माए, फिर बौद्ध धर्म वंश की
आत्माए, फिर ईसाई धर्म वंश की आत्माए अपने-अपने समय पर सृष्टि-मंच पर फिर आकर अपना-अपना         अनादि-निश्चित पार्ट बजाते है I और अपनी स्वर्णिम, रजत, ताम्र और लोह, चारो अवस्थाओ को पर करती है इस प्रकार, यह अनादि निश्चित सृष्टि-नाटक अनादि काल से हर ५००० वर्ष के बाद हुबहू पुनरावृत्त होता ही रहता है I

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आत्मा क्या है और मन क्या है ? अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की ” आप कौन है ?” अथवा “आपका क्या परिचय है ?”

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February 4, 2012

 

आत्मा क्या है और मन क्या है ? अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की ” आप कौन है ?” अथवा “आपका क्या परिचय है ?” तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I वास्तव में ” में ” शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता “आत्मा ” का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I

आत्मा क्या है और मन क्या है ?
अपने सारे दिन की बातचीत में मनुष्य प्रतिदिन न जाने कितनी बार मै शब्द का प्रयोग करता है I परन्तु यह एक आश्चर्य की बात है कि प्रतिदिन मै और मेरा शब्द का अनेकानेक बार प्रयोग करने पर भी मनुष्य यथार्थ रूप में यह नहीं जानता कि मैं कहने वाली सत्ता का स्वरूप क्या है अर्थात में शब्द जिस वस्तु का सूचक है वह क्या है ? आज मनुष्य ने साइंस द्वारा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली चीजे तो बना डाली है,उसने संसार की अनेक पहेलियो का उत्तर भी जन लिया है और वह अन्य अनेक जटिल समस्याओ का हल निकलने में लगा है परन्तु में कहलाने वाला कौन है, इसके बारे में वह सत्यता को नहीं जानता अर्थात वह स्वयं को नहीं पहचानता I  आज किसी मनुष्य से पूछा जाय की ” आप कौन है ?” अथवा “आपका क्या परिचय है ?” तो वह झट अपने शरीर का नाम बता देगा अथवा जो वह धंधा करता है वह उसका नाम बता देगा I
वास्तव में  ” में ” शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता “आत्मा ” का सूचक है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है I  मनुष्य (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलकर बनता है I जैसे शरीर पञ्च तत्वों ( जल, वायु ,अग्नि , आकाश और पृथ्वी ) से बना हुआ होता है वैसे ही आत्मा मन बुद्दि और संस्कारमय होती है I आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती है I तथा वह जैसा कर्म करती है उसी के अनुसार उसके संस्कार बनते है I
आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए  एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा  लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए  एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा  लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगता आत्मा एक चेतन एवं अविनाशी ज्योति-बिंदु है जो कि मानव देह में भृकुटी में निवास करती है इजैसे रात्रि को आकाश में जगमगाता हुआ तारा एक बिंदु-सा दिखाई देता है , वैसे ही दिव्य-दृष्टी द्वारा आत्मा भी एक तारे क़ी तरह दिखाई देती है इसीलिए  एक प्रसिद्द पद में कहा गया है -”भृकुटी में चमकता है एक अजब तारा , गरीबा नूं साहिबा  लगदा ए प्यारा I आत्मा का वास भृकुटी  में होने के कारण ही मनुष्य गहराई से सोचते समय यहीं हाथ लगाता है I जब वह यह कहता है कि मेरे तो भाग्य खोटे है , तब भी वह यहीं हाथ लगता है I आत्मा का यहाँ वास होने के कारण ही भक्त-लोगो में यहा ही बिंदी अथवा तिलक लगाने क़ी प्रथा है  I यहाँ आत्मा का सम्बन्ध मस्तिस्क से जुड़ा है और मस्तिष्क का सम्बन्ध शरीर में फैले ज्ञान-तंतुओ से है I आत्मा ही में पहले संकल्प उठता है और फिर मस्तिस्क तथा तंतुओ द्वारा व्यक्त होता है I आत्मा   ही शांति अथवा दुःख का अनुभव करती तथा निर्णय करती है और उसी में संस्कार रहते है I अत: मन और बुद्दि आत्मा से अलग नहीं है I परन्तु  आज आत्मा स्वयं को भूलकर देह -स्त्री , पुरुष ,बुड़ा , जवान इत्यादी मान बैठी है I यह देह-अभिमान ही दुःख का कारण है इ
उपरोक्त रहस्य को मोटर के ड्राईवर के उदाहरण द्वारा भी स्पष्ट किया गया है इ शरीर मोटर के समान है तथ आतम इसका ड्राईवर है , अर्थात जैसे ड्राईवर मोटर का नियंत्रण करता है , उसी प्रकार आत्मा शरीर का नियत्रण करती है I आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण है , जैसे ड्राईवर के बिना मोटर I अत: परमपिता  परमात्मा कहते है कि अपने आपको पहचानने से ही मनुष्य इस शरीर रूपी मोटर को चला सकता है और अपने लक्ष्य ( गंतव्य स्थान ) पर पहुँच सकता है अन्यथा जैसे कि ड्राईवर कर चलाने में निपुण न होने के कारण दुर्घटना (एक्सिडेंट) का शिकार बन जाता है और कार और उसके यात्रियों को भी चोट लगती है, इसी प्रकार जिस मनुष्य को अपनी पहचान नही है वह स्वयं तो दु:खी और अशांत होता ही है, साथ ही अपने संपर्क में आने वाले मित्र संबंधियों को भी दु:खी व् अशांत बना देता है I अत: सच्चे सुख व् सच्ची शांति के लिए स्वयं को जानना अति आवश्यक है I 

 

 

निकट भविष्य में श्रीकृष्ण आ रहे है प्रतिदिन समाचार -पत्रों में अकाल, बाड़, भ्रष्टाचार व् लड़ाई- झगडे का समाचार पदने को मिलता है I प्रकृति के पांच तत्व भी मनुष्य को दुःख दे रहे है और सारा ही वातावरण दूषित हो गया है I अत्याचार, विषय-विकार तथा अधर्म का ही बोलबाला है I और यह विश्व ही “काँटों का जंगल” बन गया है I एक समय था जबकि विश्व में सम्पूर्ण सुख शांति का साम्राज्य था और यह सृष्टि फूलो का बगीचा कहलाती थी I प्रकृति भी सतोप्रधान थी I और किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदाए नही थी I मनुष्य भी सतोप्रधान , देविगुण संपन्न थे I और आनंद ख़ुशी से जीवन व्यतीत करते थे I उस समय यह संसार स्वर्ग था, जिसे सतयुग भी कहते है इस विश्व में समृद्धि,, सुख, शांति का मुख्य कारण था कि उस समय के राजा तथा प्रजा सभी पवित्र और श्रेष्ठाचारी थे इसलिए उनको सोने के रत्न-जडित ताज के अतिरिक्त पवित्रता का ताज भी दिखाया गया है I श्रीकृष्ण तथा श्री राधा सतयुग के प्रथम महाराजकुमार और महाराजकुमारी थे जिनका स्वयंवर के पश्चात् ” श्री नारायण और श्री लक्ष्मी” नाम पड़ता है I उनके राज्य में ” शेर और गाय” भी एक घाट पर पानी पीते थे, अर्थात पशु पक्षी तक सम्पूर्ण अहिंसक थे I उस समय सभी श्रेष्ठाचारी, निर्विकारी अहिंसक और मर्यादा पुरुषोत्तम थे, तभी उनको देवता कहते है जबकि उसकी तुलना में आज का मनुष्य विकारी, दुखी और अशांत बन गया है I यह संसार भी रौरव नरक बन गया है I सभी नर-नारी काम क्रोधादि विषय-विकारो में गोता लगा रहे है I सभी के कंधे पर माया का जुआ है तथा एक भी मनुष्य विकारो और दुखो से मुक्त नहीं है I अत: अब परमपिता परमात्मा, परम शिक्षक, परम सतगुरु परमात्मा शिव कहते है, ” हे वत्सो ! तुम सभी जन्म-जन्मान्तर से मुझे पुकारते आये हो कि – हे पभो , हमें दुःख और अशांति से छुडाओ और हमें मुक्तिधाम तथा स्वर्ग में ले चलो I अत: अब में तुम्हे वापस मुक्तिधाम में ले चलने के लिए तथा इस सृष्टि को पावन अथवा स्वर्ग बनाने आया हु I वत्सो, वर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है अब आप वैकुण्ठ ( सतयुगी पावन सृष्टि) में चलने की तैयारी करो अर्थात पवित्र और योग-युक्त बनो क्योंकि अब निकट भविष्य में श्रीकृष्ण ( श्रीनारायण) का राज्य आने ही वाला है तथा इससे इस कलियुगी विकारी सृष्टि का महाविनाश एटम बमों, प्राकृतिक आपदाओ तथा गृह युद्ध से हो जायेगा I चित्र में श्रीकृष्ण को ” विश्व के ग्लोब” के ऊपर मधुर बंशी बजाते हुए दिखाया है जिसका अर्थ यह है कि समस्त विश्व में ” श्रीकृष्ण” ( श्रीनारायण) का एक छात्र राज्य होगा, एक धर्म होगा, एक भाषा और एक मत होगी तथा सम्पूर्ण खुशहाली, समृद्धि और सुख चैन की बंशी बजेगी I बहुत-से लोगो की यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण द्वापर युग के अंत में आते है I उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि श्रीकृष्ण तो सर्वगुण संपन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी एवं पूर्णत: पवित्र थे I तब भला उनका जन्म द्वापर युग की रजो प्रधान एवं विकारयुक्त सृष्टि में कैसे हो सकता है ? श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए सूरदास ने अपनी अपवित्र दृष्टी को समाप्त करने की कोशिश की और श्रीकृष्ण- भक्तिन मीराबाई ने पवित्र रहने के लिए जहर का प्याला पीना स्वीकार किया, तब भला श्रीकृष्ण देवता अपवित्र दृष्टी वाली सृष्टि में कैसे आ सकते है ? श्रीकृष्ण तो स्वयंबर के बाद श्रीनारायण कहलाये तभी तो श्रीकृष्ण के बुजुर्गी के चित्र नही मिलते I अत: श्रीकृष्ण अर्थात सतयुगी पावन सृष्टि के प्रारम्भ में आये थे और अब पुन: आने वाले है I

निकट भविष्य में  श्रीकृष्ण  आ  रहे  है

प्रतिदिन  समाचार -पत्रों में अकाल, बाड़, भ्रष्टाचार  व् लड़ाई- झगडे का समाचार पदने को मिलता है I प्रकृति के पांच तत्व भी मनुष्य को दुःख दे रहे है और सारा ही वातावरण दूषित हो गया है I अत्याचार, विषय-विकार तथा अधर्म का ही बोलबाला है I और यह विश्व ही “काँटों का जंगल” बन गया है I एक समय था जबकि विश्व में सम्पूर्ण सुख शांति का साम्राज्य था और यह सृष्टि फूलो का बगीचा कहलाती थी I प्रकृति भी सतोप्रधान  थी I और किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदाए नही थी I मनुष्य भी सतोप्रधान , देविगुण संपन्न थे I और आनंद ख़ुशी से जीवन व्यतीत करते थे I उस समय यह संसार स्वर्ग था, जिसे सतयुग भी कहते है इस विश्व में समृद्धि,, सुख, शांति का मुख्य कारण था कि उस समय के राजा तथा प्रजा सभी पवित्र और श्रेष्ठाचारी थे इसलिए उनको सोने के रत्न-जडित ताज के अतिरिक्त पवित्रता का ताज भी दिखाया गया है I श्रीकृष्ण तथा श्री राधा   सतयुग के प्रथम महाराजकुमार  और महाराजकुमारी थे जिनका स्वयंवर के पश्चात् ” श्री नारायण और श्री लक्ष्मी” नाम पड़ता है I उनके राज्य में ” शेर और गाय” भी एक घाट पर पानी पीते थे, अर्थात पशु पक्षी तक सम्पूर्ण अहिंसक थे I उस समय सभी श्रेष्ठाचारी, निर्विकारी अहिंसक और मर्यादा पुरुषोत्तम थे, तभी उनको देवता कहते है जबकि उसकी तुलना में आज का मनुष्य विकारी, दुखी और अशांत बन गया है I यह संसार भी रौरव नरक बन गया है I सभी नर-नारी काम क्रोधादि विषय-विकारो में गोता लगा रहे है I सभी के कंधे पर माया का जुआ है तथा एक भी मनुष्य विकारो और दुखो से मुक्त नहीं है I
            अत: अब परमपिता परमात्मा, परम शिक्षक, परम सतगुरु परमात्मा शिव कहते है, ” हे वत्सो ! तुम सभी जन्म-जन्मान्तर से मुझे पुकारते आये हो कि – हे पभो , हमें दुःख और अशांति से छुडाओ और हमें मुक्तिधाम तथा स्वर्ग में ले चलो I अत: अब में तुम्हे वापस मुक्तिधाम में ले चलने के लिए तथा इस सृष्टि को पावन अथवा स्वर्ग बनाने आया हु I वत्सो, वर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है अब आप वैकुण्ठ ( सतयुगी पावन सृष्टि) में चलने की तैयारी करो अर्थात पवित्र और योग-युक्त बनो क्योंकि अब निकट भविष्य में श्रीकृष्ण ( श्रीनारायण) का राज्य आने ही वाला है तथा इससे इस कलियुगी विकारी सृष्टि का महाविनाश एटम  बमों, प्राकृतिक आपदाओ तथा गृह युद्ध से हो जायेगा I चित्र में श्रीकृष्ण को ” विश्व के ग्लोब” के ऊपर मधुर बंशी बजाते  हुए दिखाया है जिसका अर्थ यह है कि समस्त विश्व में            ” श्रीकृष्ण” ( श्रीनारायण) का एक छात्र राज्य होगा, एक धर्म होगा, एक भाषा और एक मत होगी तथा सम्पूर्ण खुशहाली, समृद्धि और सुख चैन की बंशी बजेगी I
        बहुत-से लोगो की यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण द्वापर युग के अंत में आते है I उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि श्रीकृष्ण तो सर्वगुण संपन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी  एवं पूर्णत: पवित्र थे I तब भला उनका जन्म द्वापर युग की रजो प्रधान एवं विकारयुक्त सृष्टि में कैसे हो सकता है ? श्रीकृष्ण  के दर्शन के लिए सूरदास ने अपनी अपवित्र दृष्टी को समाप्त करने की कोशिश की और श्रीकृष्ण- भक्तिन मीराबाई ने पवित्र रहने के लिए जहर का प्याला पीना स्वीकार किया, तब भला श्रीकृष्ण देवता अपवित्र दृष्टी वाली सृष्टि में कैसे आ सकते है ? श्रीकृष्ण तो स्वयंबर के बाद श्रीनारायण कहलाये तभी तो श्रीकृष्ण के बुजुर्गी के चित्र नही मिलते I अत: श्रीकृष्ण अर्थात सतयुगी पावन सृष्टि के प्रारम्भ में आये थे और अब पुन: आने वाले है I

 

निकट भविष्य में श्रीकृष्ण आ रहे है प्रतिदिन समाचार -पत्रों में अकाल, बाड़, भ्रष्टाचार व् लड़ाई- झगडे का समाचार पदने को मिलता है I प्रकृति के पांच तत्व भी मनुष्य को दुःख दे रहे है और सारा ही वातावरण दूषित हो गया है I अत्याचार, विषय-विकार तथा अधर्म का ही बोलबाला है I और यह विश्व ही “काँटों का जंगल” बन गया है I एक समय था जबकि विश्व में सम्पूर्ण सुख शांति का साम्राज्य था और यह सृष्टि फूलो का बगीचा कहलाती थी I प्रकृति भी सतोप्रधान थी I और किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदाए नही थी I मनुष्य भी सतोप्रधान , देविगुण संपन्न थे I और आनंद ख़ुशी से जीवन व्यतीत करते थे I उस समय यह संसार स्वर्ग था, जिसे सतयुग भी कहते है इस विश्व में समृद्धि,, सुख, शांति का मुख्य कारण था कि उस समय के राजा तथा प्रजा सभी पवित्र और श्रेष्ठाचारी थे इसलिए उनको सोने के रत्न-जडित ताज के अतिरिक्त पवित्रता का ताज भी दिखाया गया है I श्रीकृष्ण तथा श्री राधा सतयुग के प्रथम महाराजकुमार और महाराजकुमारी थे जिनका स्वयंवर के पश्चात् ” श्री नारायण और श्री लक्ष्मी” नाम पड़ता है I उनके राज्य में ” शेर और गाय” भी एक घाट पर पानी पीते थे, अर्थात पशु पक्षी तक सम्पूर्ण अहिंसक थे I उस समय सभी श्रेष्ठाचारी, निर्विकारी अहिंसक और मर्यादा पुरुषोत्तम थे, तभी उनको देवता कहते है जबकि उसकी तुलना में आज का मनुष्य विकारी, दुखी और अशांत बन गया है I यह संसार भी रौरव नरक बन गया है I सभी नर-नारी काम क्रोधादि विषय-विकारो में गोता लगा रहे है I सभी के कंधे पर माया का जुआ है तथा एक भी मनुष्य विकारो और दुखो से मुक्त नहीं है I अत: अब परमपिता परमात्मा, परम शिक्षक, परम सतगुरु परमात्मा शिव कहते है, ” हे वत्सो ! तुम सभी जन्म-जन्मान्तर से मुझे पुकारते आये हो कि – हे पभो , हमें दुःख और अशांति से छुडाओ और हमें मुक्तिधाम तथा स्वर्ग में ले चलो I अत: अब में तुम्हे वापस मुक्तिधाम में ले चलने के लिए तथा इस सृष्टि को पावन अथवा स्वर्ग बनाने आया हु I वत्सो, वर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है अब आप वैकुण्ठ ( सतयुगी पावन सृष्टि) में चलने की तैयारी करो अर्थात पवित्र और योग-युक्त बनो क्योंकि अब निकट भविष्य में श्रीकृष्ण ( श्रीनारायण) का राज्य आने ही वाला है तथा इससे इस कलियुगी विकारी सृष्टि का महाविनाश एटम बमों, प्राकृतिक आपदाओ तथा गृह युद्ध से हो जायेगा I चित्र में श्रीकृष्ण को ” विश्व के ग्लोब” के ऊपर मधुर बंशी बजाते हुए दिखाया है जिसका अर्थ यह है कि समस्त विश्व में ” श्रीकृष्ण” ( श्रीनारायण) का एक छात्र राज्य होगा, एक धर्म होगा, एक भाषा और एक मत होगी तथा सम्पूर्ण खुशहाली, समृद्धि और सुख चैन की बंशी बजेगी I बहुत-से लोगो की यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण द्वापर युग के अंत में आते है I उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि श्रीकृष्ण तो सर्वगुण संपन्न, सोलह कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी एवं पूर्णत: पवित्र थे I तब भला उनका जन्म द्वापर युग की रजो प्रधान एवं विकारयुक्त सृष्टि में कैसे हो सकता है ? श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए सूरदास ने अपनी अपवित्र दृष्टी को समाप्त करने की कोशिश की और श्रीकृष्ण- भक्तिन मीराबाई ने पवित्र रहने के लिए जहर का प्याला पीना स्वीकार किया, तब भला श्रीकृष्ण देवता अपवित्र दृष्टी वाली सृष्टि में कैसे आ सकते है ? श्रीकृष्ण तो स्वयंबर के बाद श्रीनारायण कहलाये तभी तो श्रीकृष्ण के बुजुर्गी के चित्र नही मिलते I अत: श्रीकृष्ण अर्थात सतयुगी पावन सृष्टि के प्रारम्भ में आये थे और अब पुन: आने वाले है I

 

हमारे देश के लोगों का सबसे बड़ा दोष है-परनिंदा करना। बहुत कम लोग हैं जो इसके कीटाणुओं से मुक्त रह पाते हैं। देखने में भक्त और साधु किस्म के लोग भी इस बीमारी से उतने ही ग्रस्त होते हैं जितने सामान्य लोग। अगर कहीं चार लोगों के बीच चर्चा करो तो वहां अनुपस्थित व्यक्ति की निंदा हाल शुरू हो जाती है।कई बार तो विचित्र स्थिति भी सामने आ जाती है। जब एक आदमी किसी दूसरे से अन्य के बारे में चर्चा करते हुए उसके दोष गिनाता है और श्रोता व्यक्ति यह सोचकर हंसता है कि यह दोष तो कहने वाले में भी है पर वह नहीं समझता। उसे लगता है कि दूसरा आदमी उसकी बात से सहमत ।लोग परनिंदा में लिप्त तो होते हैं पर उससे घबड़ाते बहुत हैं। यही कारण है कि कई तरह के मानसिक बोझ व्यर्थ गधे की तरह ढोकर अपना जीवन नरक बनाते हैं यह अलग बात है कि वह मरणोपरांत स्वर्ग की कल्पना करना नहीं छोड़ते। ‘लोग क्या कहेंगे’, और ‘लोग क्या सोचेंगे’।
एक सज्जन दूसरे से अपने ही एक मित्र के बारे में कह रहे थे-‘वह तो दिखने का ही भला आदमी है। मैं तो उसे ऐसे ही अपना मित्र कहता हूं क्योंकि उससे काम निकालना होता है। वह तो अपने बाप का नहीं हुआ तो मेरा क्या होगा? उसक मां बाप अलग रहते हैं। दोनों बीमार हैं पर वह उनके पास जाता तक नहीं है। न ही पैसा देता है। बिचारे रोते रहते हैं। ऐसा आदमी इस दुनियां मेंे किस काम का जो मां बाप की सेवा नहीं करता।’दूसरे ने कहा-‘भई, किसी के परिवार के विवादों को सार्वजनिक रूप से चर्चा नहीं करो तो अच्छा! आज तुम उनके बारे में कह रहे हो कल कोइ्र्र तुम्हारे बारे में भी कह सकता है। उसके मां बाप तो उसके घर से दूर रहते हैं हो सकता है वह अपने कार्य की व्यस्तता के कारण नहीं जा पाता हो। तुम्हारे मां बाप तो एकदम पास ही रहते हैं पर वह भी तुम्हारे बारे में ऐसी ही बातें करते हैं। यह तो घर घर की कहानी है।’
पहले वाले सज्जन एकदम तैश में आ गये और बोले-‘वह तो बुजुर्गों की आदत होती है। वैसे मैने तो अपने दम पर ही अपना मकान और सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित की है। अपने मां बाप से एक भी पैसा नहीं लिया। उन्होंने सब छोटे भाई को दे दिया है। उससे तो मेरी तुलना हो ही नहीं सकती।’बहरहाल दोनों में बातचीत से तनाव बढ़ा और फिर दोनों में बातचीत ही बंद हो गयी। अपने दोष कोई सुन नहीं सकता पर दूसरे का प्रचार हर कोई ऐसे करता है जैसे कि वह सर्वगुण संपन्न हो।किसी सात्विक विषय पर चर्चा करने की बजाय हर पल अपने लिये समाज के खलपात्र ढूंढने लगते हैं। नहीं मिलें तो फिल्मी सितारों और खलपात्रों की ही बात करेंगे। कहीं भी जाओ तो बस यही जुमले सुनाई देंगे‘अमुक आदमी ने अपने मां बाप को जीवन भर पूछा ही नहीं पर मर गया तो तेरहवीं पर पानी की तरह पैसा बहाया ताकि समाज के लोग खापीकर उसकी प्रशंसा करें’ या फिर ‘अमुक का लड़का नकारा है इसलिये ही उसकी बहुत भाग गयी आदि आदि।
तमाम तरह के संत और साधु अपने भक्तों के सामने प्रवचन में कहते हैं कि ‘परनिंदा मत करो‘ कार्यक्रम खत्म होते ही अपने निजी सेवकों और भक्तों के समक्ष दूसरे संतों की निंदा करने लग जाते हैं। उन पर आश्रित सेवक या भक्त उनके सामने कैसे कह सकता है कि कि ‘महाराज अभी तो आप परनिंदा की लिये मना कर रहे थे और आप जो कह रहे हैं क्या वह परंनिदा नहीं है।’जैसे वक्ता वैसे ही श्रोता। श्रोता ऐसे बहरे कि उनको लगता है कि वक्ता जैसे गूंगा हो।
पंडाल में प्रवचन करते हुए वक्ता कह रहा है ‘परनिंदा मत करो’, पर वहां बैठे श्रोता तो व्यस्त रहते हैं अपने घर परिवार की चिंताओं में या अपने साथ आये लोगों के साथ वार्ताओं में। कोई अपने दामाद से खुश है तो कोई नाखुश। बहू से तो कोई सास कभी खुश हो ही नहीं सकती। उसी तरह बहुत कम बहूऐं ऐसी मिलेंगी जो सास की प्रशंसा करेंगी। लोग इधर उधर निंदा में ही अपना समय व्यतीत करते हैं और जिनको सुनने वाले लोग नहीं मिलते वह ऐसे सत्संग कार्यक्रमों की सूचना का इंतजार करते हैं कि वहां कोई पुराना साथी मिल जाये तो जाकर दिल की भड़ास निकालें।ऐसा लगता है कि इसे देश में मौजूद लोगों परनिंदा करने की भूख को शांत करने के लिये ही ऐसे पारंपरिक मिलन समारोह बनाये गये हैं जहां आकर सब अपने को छोड़कर बाकी सभी की निंदा कर सकें। कई तो व्यवसाय ही इसलिये फल रहे हैं। फिल्म में एक नायक और एक खलनायक इसलिये ही रखा जाता है ताकि लोग नायक में अपनी छबि देखें और खलनायक में किसी दूसरे की। बातचीत मेंं लोग जिससे नाखुश होते हैं उसके लिये किसी फिल्मी खलनायक की छबि ढूंढते हैं।
आजकल के प्रचार माध्यम तो टिके ही परनिंदा के आसरे हैं। वह अपने लिये समाज के ऐसे खलपात्रों का ही प्रचार करते हैं जो अपराध तो करते हैं पर आसपास दिखाई नहीं देते। उन पर ढेर सारे शब्द और समय व्यय किया जाता है। लोग एकरसता से ऊबे नहीं इसलिये बीच बीच में भले लोगों के रचनात्मक काम का प्रदर्शन भी कर देते हैं। अखबार हों या टीवी चैनल ऐसी खबरों को ही महत्वपूर्ण स्थान देते हैं जिनमें दूसरों का दोष लोगों को अधिक दिखाई दे। कहीं बहू खराब तो कहीं सास, कहीं जमाई तो कही ससुर खूंखार और कही भाई तो कहीं साला अपराधी। लोग बड़े चाव से देखते हैं खराब व्यक्ति को। तब उनको आत्मतुष्टि मिलती हैं कि हम तो ऐसे नहीं हैं।
इसी कारण कहा भी जाता है कि ‘बदनाम हुए तो क्या नाम तो है’। रचनात्मक काम के परिश्रम अधिक लगता है कि नाम पाने के लिये मरणोपरांत ही संभावना रहती है जबकि विध्वंस में तत्काल चर्चा हो जाती है। अखबार और टीवी में नाम आ जाता हैं। भले लोग को अपना यह जुमला दोहराने का अवसर निरंतर मिलता है‘आजकल जमाना बहुत खराब है’। यह सुनते हुए बरसों हो गये हैं। यह पता हीं लगता कि जमाना सही था कब? एक भला आदमी दूसरे से संबंध रखने की बजाय दादा टाईप के आदमी से संबंध रखता है कि कब उससे काम पड़ जाये। हर किसी को दादा टाईप लोगों में ही दिलचस्पी रहती है।
कुल मिलाकर परनिंदा पर ही यह भौतिक संसार टिका हुआ है। अनेक लोगों की रोजी रोटी तो केवल इसलिये चलती है कि वह परनिंदा करते हैं तो कुछ कथित महान लोगों को इसलिये मक्खन खाने की अवसर मिलता है क्योंकि वह लोगों का संदेश देते हैं कि परनिंदा मत करो। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि सारा संसार ही परंनिंदा पर टिका है।
दूसरों की निंदा से नुकसान आपका ही होना है
कुछ लोगों की आदत होती है कि वो बातचीत की शुरुआत दूसरों की निंदा से ही करते हैं. अगर आप भी उनमें से एक हैं, तो आपको तुरंत संभल जाने की जरूरत है. हो सकता है कि आप इन्टेंशनली ऐसा नहीं करते हों, लेकिन अगर आपको निंदा करने में आनंद भी आता है, तो यह आपके लिए अलार्मिग बेल है.
आपको समझ जाना चाहिए कि आपका रास्ता कहीं और जा रहा है. दूसरे क्या कर रहे हैं, क्या नहीं कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं, यह देखना उनका काम है, आपका नहीं. अपनी शक्तियों का प्रवाह रचनात्मक और सकारात्मक कार्यो की तरफ करें. दूसरों की निंदा करने में अगर शक्ति लगायेंगे, तो शक्ति व्यर्थ जायेगी और इसका लाभ तो नहीं ही मिलना है.
स्वामी आत्मानंद जब बाल्यावस्था में थे, तब से ही पिता के साथ अमरनाथ तीर्थ की यात्र में साथ जाया करते थे. तीर्थ यात्रियों के दल में कुछ अनुशासन के नियम थे, जिनका पालन करने का सभी को आदेश था.
एक बार बालक आत्मानंद ने पिता से शिकायत की-पिताश्री, दल के कई सदस्य खाने के बाद अपनी जूठी पत्तल वहीं छोड़ देते हैं. क्या उन्हें नहीं पता कि यदि सब ऐसा करेंगे, तब कितना बुरा लगेगा.पिता ने कहा-पुत्र इससे तो अच्छा था कि तुम भी अपना पत्तल छोड़ देते. कम से कम परनिंदा के भागी तो नहीं बनते. पुत्र के चेहरे पर पश्चाताप के भाव थे. पिता ने सस्नेह उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा-वत्स एक बार उनके द्वारा छोड़ी गयी पत्तल सेवा भाव से उठा कर तो देखो, तुम्हें बहुत आनंद प्राप्त होगा. अगले दिन पुत्र ने सबकी छोड़ी हुई पत्तल स्वयं उठायी और कूड़ेदान में डाल दी. उसे बड़ा अच्छा लगा. साथ ही पिता की सीख से अन्य सदस्यों को भी लाभ पहुंचा.अगले दिन से सबने खाने के बाद अपनी-अपनी पत्तल उठाना आरंभ कर दिया था. परनिंदा से बेहतर यह है कि रचनात्मक कार्य करें. याद रखें निंदा करके आप सबसे पहले अपना नुकसान करते हैं.
बात पते की
– अगर आपको दूसरों की निंदा करना अच्छा लगता है, तो समझ लें कि आप अपने लक्ष्य से भटक चुके हैं, तुरंत आदत में सुधार लायें.
– परनिंदा से बेहतर है कि रचनात्मक कार्य करें. याद रखें निंदा करके आप सबसे पहले अपना नुकसान करते हैं.
एक बार एक पिता पुत्र अनेक व्याक्तियो के साथ तीर्थ यात्रा पार जा रहे थे | रात्री का समय था, आधी रात ढल चुकी थी, लेकीन उजाला नही हुआ था | चारो ओर एक निराली शांती थी | पिता का चित निर्मल ही | वे प्रार्थना कि तैयारी करने लगे | उनके मन मैं आया कि क्यो नही वे अपने पुत्र को भी जगा ले जिससे वह भी इस शान्त घडी मैं प्रार्थना कर सके | यह सोच कर उन्होने अपने बेटे को जगाया | बेटा युवा अवस्था मैं था | रात्री मैं उठने मैं उसे काठीनाई हुई फिर भी, पिता जी को जगते देखकर वह भी उठ बैठा | बेटे ने देखा कि सभी गहरी नींद मैं सो रहे है | पिता ने बेटे से कहा – आओ, प्रार्थना करे | कितना अच्छा सुहावना ओर उपयुक्त समय है |बेटा चंचल चित्त का था | पिता के भावो कि गहराई को नही समज सका ओर कहने लगा – पिता जी ये सभी जो सो रहे है, कितने “पापी” है ? इन्हे भी प्रभू प्रार्थना कारणी चाहिये | पिता का मन उदासी से भर गया | उन्होने कहा बेटे, इस अद्वितीय क्षण मै भी तेरा मन परनिंदा मै लगा है तो जा तू भी सो जा | परनिंदा करणे कि अपेक्षा तो तेरा सो जाना ही उपयुक्त है |जी हां, जो पार निन्दा में भागीदार होते हैं, जिनको परनिंदा मी मजा आता हैं वे लोग आनंद कि अनुभूती कर नही सकते | यही मजा मजबुरी मी बदलता हैं तो मन मसोसना पडता हैं | जो परनिंदा में लगे हैं हमारे विचारो में वे आईना देख रहे हैं | जी हां, दर्पण कभी झूठ नही बोलता हैं वह तो देखने वाले कि तस्वीर ही खाता हैं |
हम हम यदि परनिंदा बजाय दुसरो कि अच्छाई एवं उनके सदगुणो का बखान करना शुरू कर दे तो मजे के बजाय आनंद कि प्राप्ती होगी | जी हां, आनंद कभी समाप्त नही होता वह आनंद मिलेगा यदि हम अपने चश्मों का रंग बदलकर अच्छे कार्यो कि सराहना का स्वभाव बना दें | निन्दा कि आदत को गुणो का खान कि आदत में बदल दें तो हम मानवता कि ओर उठेंगे | जिस प्रकार अपने स्वभाव से पानी उपर से नीचे को ओर जाता हैं, ठीक यदि हमें उपर उठना हैं तो पर निन्दा परित्योग कर अन्यो की अच्छाइयो का नुसरण करना होगा |आईये सेवा की मोटार हमारे मन मस्तिष्क पर लगादें , औश्र जहां भी सेवा एवं परोपकार के कार्य हो उनका अनुमोदन करे, महापुरुषो के चरित्र की चर्चा करे ओर भगवत कार्यो में हमारा मन लगावे | जहां भी प्रभू कार्य हो करने से न चुके, जो करना चाहे उन्हे प्रेरित कर करावे एवं जहां ऐसे कार्य हो रहे हो उनका उत्साह वर्धन करे, फिर देखिये आनंद आपको छोडेगा नही |
निंदा प्राय: तीन तरह की होती है –
कारण वश , ईर्ष्या वश और स्वभाव वश । कारण वश निंदा का आधार किसी किये गये कार्य के नैतिकता या नियम के प्रतिकूल होने या कार्य के अपेक्षानुकूल परिणाम न आने या किसी के द्वारा अनुचित व्यवहार या आचरण करने के विरुद्ध होती है। यह निंदा स्वाभाविक व तथ्यपरक होती है । दूसरी कोटि की निंदा ईर्ष्या वश होती है। यदि हम किसी के प्रति ईर्ष्यालु हैं, किसी के प्रति हमारे मन व हृदय में डाह,जलन या ईर्ष्या है तो हम उस व्यक्ति के कुछ भी अच्छे-बुरे कार्य या व्यवहार की निंदा करते हैं ।यह निँदा कभी कभी तथ्यपरक हो सकती है, पर प्राय: यह विद्वेषपूर्ण व लक्षित व्यक्ति को हानि पहुँचाने की नियति से होती है।तीसरी कोटि की निंदा स्वभाव वश होती है । कुछ व्यक्तियों का स्वभाव ही होता है कि वे किसी भी काम की या व्यक्ति की- चाहे अच्छा हो या बुरा निंदा ही करते है। ऐसे लोग सिवाय अपने किसी दूसरे के काम या व्यवहार की निंदा किये बिना रह ही नहीं सकते।उन्हे यह रंचमात्र अहसास भी नहीं होता कि उनके इस क्षणिक निंदारस का आनंद किसी को कितनी हानि,आघात या दु:ख पहुँचा सकता है ।अब प्रश्न यह उठता है कि निंदा का कोई भी कारण हो, क्या हम नैतिक आधार पर किसी भी दूसरे की निंदा करने के अधिकारी हैं। मैने इस प्रश्न पर बहुत मंथन किया पर अपने अंत:करण से यही उत्तर मिलता है कि नहीं, हमें किसी दूसरे की निंदा करने का कोई अधिकार नहीं।हम प्रत्येक से गाहे-बगाहे, जाने-अनजाने कोई न कोई गलती होती ही रहती है, किंतु हम स्वयं की तो कोई निंदा नहीं करते, बजाय हम अपने गलत से गलत, बुरे से बुरे , अनुचित से अनुचित कार्य ,कार्य के परिणाम,आचरण या व्यवहार को उचित,तर्कसंगत व न्यायोचित ठहराने की कोशिश करते हैं।हम अपने द्वारा किये गये किसी गलती या गलत कार्य अथवा कार्य के खराब या असफल होने का कोई न कोई तथ्यपूर्ण कारण, परिस्थिति, मजबूरी या विवशता या रिहार्यता बताकर उसे उचित ठहराने की कोशिश करते हैं।
इस तरह जब हम सबसे कोई न कोई गलती होती है, और हम अपनी खुद की गलतियों के लिये स्वयं को माफ कर लेते हैं और स्वयं के कृत्य की निंदा कदापि नहीं करते तो हमें किसी दूसरे की निंदा करने का भला क्या नैतिक आधार बनता है।तो अगर हम अपने अंतरात्मा की आवाज सुनें तो हमें परनिंदा का कोई नैतिक अधिकार नहीं।पर असली मसला तो यह है कि हम अपने अंतरात्मा की आवाज कितनी सुनते हैं और उसपर कितनी गंभीरता से अमल करते हैं निंदा रस से बच कर रहें
हमारा प्रिय शगल है दूसरों की निंदा करना। सदैव दूसरों में दोष ढूंढते रहना मानवीय स्वभाव का एक बड़ा अवगुण है। दूसरों में दोष निकालना और खुद को श्रेष्ठ बताना कुछ लोगों का स्वभाव होता है। इस तरह के लोग हमें कहीं भी आसानी से मिल जाएंगे।
परनिंदा में प्रारंभ में काफी आनंद मिलता है लेकिन बाद में निंदा करने से मन में अशांति व्याप्त होती है और हम हमारा जीवन दुःखों से भर लेते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अपना अलग दृष्टिकोण एवं स्वभाव होता है। दूसरों के विषय में कोई अपनी कुछ भी धारणा बना सकता है। हर मनुष्य का अपनी जीभ पर अधिकार है और निंदा करने से किसी को रोकना संभव नहीं है।
लोग अलग-अलग कारणों से निंदा रस का पान करते हैं। कुछ सिर्फ अपना समय काटने के लिए किसी की निंदा में लगे रहते हैं तो कुछ खुद को किसी से बेहतर साबित करने के लिए निंदा को अपना नित्य का नियम बना लेते हैं। निंदकों को संतुष्ट करना संभव नहीं है।
जिनका स्वभाव है निंदा करना, वे किसी भी परिस्थिति में निंदा प्रवृत्ति का त्याग नहीं कर सकते हैं। इसलिए समझदार इंसान वही है जो उथले लोगों द्वारा की गई विपरीत टिप्पणियों की उपेक्षा कर अपने काम में तल्लीन रहता है। किस-किस के मुंह पर अंकुश लगाया जाए, कितनों का समाधान किया जाए!
प्रतिवाद में व्यर्थ समय गंवाने से बेहतर है अपने मनोबल को और भी अधिक बढ़ाकर जीवन में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते रहें। ऐसा करने से एक दिन आपकी स्थिति काफी मजबूत हो जाएगी और आपके निंदकों को सिवाय निराशा के कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
संसार में प्रत्येक जीव की रचना ईश्वर ने किसी उद्देश्य से की है। हमें ईश्वर की किसी भी रचना का मखौल उड़ाने का अधिकार नहीं है। इसलिए किसी की निंदा करना साक्षात परमात्मा की निंदा करने के समान है। किसी की आलोचना से आप खुद के अहंकार को कुछ समय के लिए तो संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु किसी की काबिलियत, नेकी, अच्छाई और सच्चाई की संपदा को नष्ट नहीं कर सकते। जो सूर्य की तरह प्रखर है, उस पर निंदा के कितने ही काले बादल छा जाएं किन्तु उसकी प्रखरता, तेजस्विता और ऊष्णता में कमी नहीं आ सकती।
एक राजा ने दो विद्वानों की खूब तारीफ़ सुनी। उसने दोनौं को अपने महल में बुलाया ।एक विद्वान जब नहाने गया तो राजा ने दूसरे के बारे में पहले से उसकी राय पूंछी ।पहला विद्वान – अरे ! ये विद्वान नहीं, बैल है ।ऐसे ही राजा ने दूसरे से पहले के बारे में राय जानी ।दूसरा विद्वान – ये तो भैंस है ।जब दौनों विद्वान खाना खाने बैठे तो थालियों में घास तथा भूसा देखकर चौंक पड़े ।राजा ने कहा – आप दोनौं ने ही एक दूसरे की पहचान बतायी थी, उसी के अनुसार दोनौं को भोजन परोसा गया है ।दौनों की गर्दन शर्म से झुक गयी ।
ईष्र्या की आग
जीवन में वैर करना आसान है और वैर न करना बहुत मुश्किल है। हम वैर-भाव कब रखते हैं? जब हमारा कोई नुकसान हो जाए या फिर हमारा कोई स्वार्थ पूरा न हो। ईष्र्या तो यहीं से पैदा होती है। कम अधिक सभी किसी न किसी से वैर-भाव रखते ही हैं। ईष्र्या इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है। जो भी ईष्र्या करता है, वह अपना ही विकास रोक देता है।
आप जिससे वैर-भाव रखते हैं, वह तो केवल माध्यम है। असल में तो आप अपने से ही वैर-भाव रख रहे हैं। ईष्र्या की आग में वह नहीं आप खुद जलते हैं, तो नुकसान उसका ज्यादा हुआ या आपका? आपको यह समझना होगा कि वहां दूसरा कोई नहीं है, जिससे आप वैर-भाव रखते हैं। वह भी आप ही हैं और जिससे आप वैर भाव रखते हैं, वह मजे में है आप परेशान हैं। बेशक आप दुनिया को प्रेम मत करिए. बेशक आप प्रतियोगिता रखिए, लेकिन वैर किसी से मत करिए। जिसे आप गलत समझ रहे हैं, वह अपने कर्मो की सजा भुगत रहा है। उससे वैर करने की नहीं प्रेम करने की जरूरत है।
कोई गुस्सा हो रहा है तो आप गुस्सा होकर उसकी बराबरी क्यों करते हैं? आग को आग से क्यों बुझाते हैं? गलत को गलत से क्यों सही करते हैं? नमक से नमक नहीं खाया जाता। सुखी जीवन जीना है तो इस रहस्य को समझना होगा। नहीं तो जीवन आपका आप उसके मालिक। आपकी समझ और आपका सुख-दुख। कोई क्या कर सकता है?
परनिंदा से बचें
मन एक अणु स्वरूप है। मन का निवास स्थान ह्वदय व कार्य स्थान मस्तिष्क है। इंद्रियों व स्वयं को नियंत्रित करना व विचार करना ये मन के कार्य हैं। आज का मानव प्रतिकूल खानपान के चलते अस्वस्थ है। संयम, ध्यान, आसन प्राणायाम, भगवान नमन व जप शास्त्र से वह स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है। प्राणायाम से मन का मैल नष्ट होता है। मन को शुभ कामों में लीन रखने से, उसकी विषय विकारों की ओर होने वाली भागदौड़ भी रूक जाती है। उपवास से मन विषय-वासना से उपराम होकर अंतर्मुख होने लगता है, तो भगवान के नाम का जप सभी विकारों को मिटा देता है। मन ही बंधन व मोक्ष का कारण है।
भगवान हमारे परम हितैषी हैं। दुख व कष्ट आने पर हमें भगवान की शरण में जाना चाहिए, क्योंकि भगवान हमारा जितना भला कर सकते हैं…उतना दूसरा कोई नहीं कर सकता है। भगवान का आश्रय लेने वाले भक्त का ख्याल भगवान स्वयं रखते हैं। मन, बुद्धि व चित्त अलग-अलग हैं। शरीरों की आकृतियां भी भिन्न-भिन्न हैं, फिर भी उनमें आत्मा एक है। परनिंदा से सदैव बचें। जब कोई किसी की निंदा करता है, तो उसे नुकसान हो या न हो, लेकिन निंदा करने वाले की हानि होती है। निंदा करने से शरीर में हानिकारक द्रव्य बनते हैं, जिससे विभिन्न बीमारियों के बढ़ने का खतरा भी बढ़ता है। घर व बाहर झगडे आदि शांत हो…इसके लिए सब को मिलकर…हे प्रभु आनंद दाता…प्रार्थना करनी चाहिए।
क्या हमें परनिंदा का नैतिक अधिकार है ?
परनिंदा मनुष्य के मूल विकारों में से एक है ।इसकी मौलिकता को ही महत्व देते हुये साहित्यकारों ने नवरसों के साथ साथ निंदारस को भी स्थान दिया है । किसी से कुछ त्रुटि हो जाये, प्राय: हम उसकी निंदा करने से चूकते नहीं हैं। किसी के अच्छे कार्य की सराहना करने से हम भले ही प्राय: चूक जाते हैं, किन्तु निंदा का अवसर लाभ उठाने से भला क्या मजाल कि हम चूक जायें ।वैसे कबीर दास जी की मानें तो हमें खुद की निंदा का स्वागत करना चाहिये। उन्होने कहा है – निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय । शायद उनके इतने साहस व उदारतापूर्ण कथन का कारण यह हो सकता है कि हमारी निंदा करने वाला हमारी उन कमियों व कमजोरियों को इतने सीधे-सीधे व स्पष्ट तरीके से बता देता है जो कि हमारे मित्र व प्रियजन प्राय: छुपा देते हैं या सीधे तौर से कभी नहीं कह पाते या कहने में संकोच करते हैं ।
चाणक्य नीति:परनिंदा न करने वाले ही लोकप्रिय होते हैं
1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप्त नहीं होता। सामान्यत: सुख-दुख के प्राप्ति मनुष्य के हाथ में न होकर परमात्मा के हाथ में हैं।
2.जिस तरह बछड़ा हजारों पहुसों के बीच में अपनी माता को ढूंढ कर उसके निकट पहुंच जाता है और उसका स्तनपान करने लगता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसका पीछा करता है और उसका फल उसे अवश्य मिलता है।
3.जो वास्तविक तत्व ज्ञान कर उपदेश करने वाले गुरु को सम्मान नहीं देता वह शिष्य पहले कुत्ते की योनि में जन्म लेने के चांडाल की योनि में उत्पान होता है।
4.अगर आप समाज में लोगों की समक्ष अपनी लोकप्रियता पाना चाहते हैं तो दूसरों की निंदा करना बंद कर दो। परनिंदा करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है और इसकी वजह से वह दूसरे को छोटा साबित कर अपने को बड़ा साबित करना चाहता है। जो दूसरों के निंदा नहीं करते वह लोगों में लोकप्रिय होते हैं।
1.संसार में किसी को भी मनचाहा सुख प्राप्त नहीं होता। सामान्यत: सुख-दुख के प्राप्ति मनुष्य के हाथ में न होकर परमात्मा के हाथ में हैं।
2.जिस तरह बछड़ा हजारों पहुसों के बीच में अपनी माता को ढूंढ कर उसके निकट पहुंच जाता है और उसका स्तनपान करने लगता है वैसे ही मनुष्य का कर्म भी उसका पीछा करता है और उसका फल उसे अवश्य मिलता है।
3.जो वास्तविक तत्व ज्ञान कर उपदेश करने वाले गुरु को सम्मान नहीं देता वह शिष्य पहले कुत्ते की योनि में जन्म लेने के चांडाल की योनि में उत्पान होता है।
4.अगर आप समाज में लोगों की समक्ष अपनी लोकप्रियता पाना चाहते हैं तो दूसरों की निंदा करना बंद कर दो। परनिंदा करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृति है और इसकी वजह से वह दूसरे को छोटा साबित कर अपने को बड़ा साबित करना चाहता है। जो दूसरों के निंदा नहीं करते वह लोगों में लोकप्रिय होते हैं।

 

वर्तमान समय समस्याओं का युग है इस युग में अपने आप को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की आवश्यकता है। बिसानी पाड़ा स्थित राजयोग केन्द्र में तनाव मुक्ति पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए माउंट आबू से आए भगवान भाई ने कहा कि 19वीं सदी तर्क की थी, 20 सदी प्रगति की रही तथा 21वी सदी तनावपूर्ण रहेगी। तनावपूर्ण परिस्थितियों में स्वयं को तनाव से मुक्त रखने के लिए सकारात्मक सोच की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विपरित परिस्थितियों में हर समस्या में, हर बात को सकारात्मक सोचने की कला जीवन को सुखी बनाती है। नकारात्मक सोच अनेक बीमारियों एवं समस्याओं की जड़ है। वर्तमान परिवेश में सहन शक्ति की आवश्यकता है। महान पुरूषों ने सहनशक्ति के आधार पर ही महानता प्राप्त की है। गीता का उदाहरण देते हुए कहा कि जीवन में हर घटना कल्याणकारी है, जो हुआ वह अच्छा हुआ, जो होगा वह भी अच्छा होगा। जो व्यक्ति दूसरो के बारे में सोचता है, दूसरो को देखता है वह कभी भी सुखी नहीं रह सकता। कोई हमारे साथ गलत व्यवहार करता है तो इसका मतलब हमने भी उसके साथ गलत व्यवहार किया होगा। आध्यात्मिक सत्संग को सकारात्मक सोच का केन्द्र बताते हुए कहा कि सत्संग के माध्यम से ही हम सकारात्मक सोच अपना सकते है। ब्रह्माकुमारी रेखा ने राजयोग का महत्व बताते हुए कहा कि राजयोग द्वारा हम अपनी इंद्रियों पर संयम रखकर तनाव मुक्त रह सकते है। राजयोग की विधि बताते हुए कहा कि स्वयं को आत्मा निश्चय कर चांद, सूर्


भारत तथा पूरे विश्व में मनाये जाने वाले पर्व, अतीत में हुई ईश्वरीय और
दैवीय महान घटनाओं के यादगार हैं |
भारत तथा पूरे विश्व में मनाये जाने वाले पर्व, अतीत में हुई ईश्वरीय
और दैवीय महान घटनाओं के यादगार हैं |  सभी पर्वो के अपने-अपने महत्त्व
हैं, परन्तु कुछ इसे महापर्व होते हैं जो सृष्टि तथा मानव जीवन को नयी
सुबह और स्वर्णिम अवसर प्रदान करते हैं | इन पर्वो में में महाशिवरात्रि
का पर्व सर्वश्रेष्ठ हैं | यह महापर्व आत्मा और परमात्मा के मिलन का सुखद
संयोग, रात्रि से निकल प्रकाश में जाने तथा अज्ञानता से परिवर्तन होकर
सुजानता की नयी सुबह की दुनिया का आगमन होता हैं | सर्वआत्माओं के
परमपिता परमात्मा शिव की महिमा अपरम्पार हैं | परन्तु मानव जगत में इनके
नामे में रात्रि शब्द जुदा होता हैं | सर्व मनुष्यात्माओं को अज्ञानता की
रात्रि से निकाल सोझ्रे की दुनिया मीन ले जाने वाले पापकटेश्वर,
मुक्तेश्वर, भगवान् शिव के नामे में लग रात्रि का गहरा अर्थ है | वैसे भी
रात्रि का अर्थ केवल २४ घंटे में आने वाली रात्रि ही नहीं बल्कि पूरे
सृष्टि चक्र में आधा कल्प तक आयी अज्ञानता की रात्रि का भी द्योतक हैं |
प्रतिदिन आने वाली रात तो मनुष्य के तन और मन को शांति प्रदान करती हैं,
जिसमे मनुष्य अपनी थकान और भौतिक शारीर को आराम देता हैं | परन्तु मनुष्य
के मन और विचारों में आई अज्ञानता की रात्रि से आत्मा को तभी आराम और सुख
चैन प्राप्त होता हैं, जब मुक्ति दाता परमात्मा की शक्ति से अज्ञान
अन्धकार दूर होता हैं |
देवो के देव महादेव परमात्मा शिव की महिमा कशी से काबा तक विभिन्न रूपों
में गाई और पूजी जाती हैं शिवलिंग के रूप में परात्मा की यादगार पूरे
विश्व में पूजी जाती हैं | अनेक धर्मो और पंथो में भी निराकार परमात्मा
शिव विविध रूपों में स्वीकार्य हैं अज्ञानता की रात्रि ने मनुष्य को
परमात्मा के वास्तविक सच्चाई से दूर कर दिया हैं, इसलिए तो मुक्तिदाता को
अज्ञानता की रात्रि में आने की आवश्यकता होती हैं | वास्तव में अज्ञानता
की रात्रि ऐसी रात्रि होती हैं जिसमे मनुष्य रिश्ते, नाते, अलौकिकता को
भूल जाता हैं, और मानवीय मूल्यों को तिलांजलि दे देता हैं | पूरी दुनिया
में सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले मनुष्य रूप में मानव नहीं बल्कि दानवी
रूप धारण कर लिया हैं | अज्ञानता की रात्रि की वजह से सर्व मनुष्यों के
अन्दर आसुरीयता घर कर जाती हैं | फिर पूरी दुनिया में अत्याचार,
भ्रष्टाचार, पापाचार, बलात्कार, हिंसा आदि का राज्य हो जाता हैं | दैवी
गुणों की जगह मनुष्य आसुरी वृत्तियों से भरा काम, क्रोध, लोभ, मोह,अंहकार
की सीढियों पर चढ़ भौतिक सत्ता के बल संसार में तबाही मचाना अपना
कर्त्तव्य समझता हैं | यह घोर अज्ञानता की रात्रि का द्योतक नहीं तो और
क्या हैं? यह एसा वक्त हैं जब मनुष्यों की आस्था और विश्वास के सर्वोच्च
स्थान मंदिर, मस्जिद और अन्य पवित्र स्थानों ज्पर अन्याय, हिंसा,
अत्याचार और लूटपाट करने से भी लोग नहीं हिचकते हैं | इस घोर अज्ञानता की
रात्रि में दानवी प्रवृत्तिया मानवता को कुचल देती हैं |
ऐसा चिन्ह पूरी सृष्टि के बदलने का संकेत होता हैं समयानुसार इस सृष्टि
का परिवर्तन होना ईश्वरीय संविधान का अटल सत्य नियम हैं | चारो युगों से
बनी इस सृष्टि का कलियुग, सृष्टि चक्र की अंतिम अवस्था होती हैं | इस घोर
अज्ञानता की रात्रि वाले समय कलियुग के आदि और सतयुग के प्रारंभ में
सृष्टि के जगत नियंता, सर आत्माओं के पिता विश्व कल्याणकारी परमपिता
परमात्मा शिव का अवतरण होता हैं | बूढे नंदी बैल अर्थात मनुष्य के साधारण
तन का आधार लेकर इस पूरी दुनिया का महान परिवर्तन करने का महान कार्य
करते हैं | अज्ञानता की रात्रि को मिटाकर आध्यात्मिक ज्ञान और आध्यात्मिक
शक्ति से स्वर्णिम दुनिया की स्थापना का महान कार्य करते हैं | इसी का
यादगार शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता हैं |
फाल्गुन मास के अंत में मनाये जाने वाला शिवरात्रि का पर्व नयी सुबह लेकर
आता है | इस पर्व का समय के हिसाब से विशलेषण करें तो भारतीय महीने के
अनुसार यह वर्ष का अंतिम महिना होता है इसके बाद प्रकति के तत्व भी अपना
कलेवर बदल कर सुखदायी हो जाते है | जिसे बसंत ऋतू कहते है | यह सभी ऋतुओं
में सबसे सुन्दर और सुखदायी ऋतू होती है | पेड़ पोधे भी अपनी पुरानी
पत्त्तियों को छोड़ नयी पत्तियां धारण कर लेते है | धरती भी अपने गर्भ से
सुगन्धित पुष्पों को जन्म देकर चारो तरफ खुशहाली और सदभावना का संसेश
देती है | भगवान शिव जब अज्ञानता की रात्रि अर्थात कलियुग को बदलकर सतयुग
की महिमा का द्योतक है बसंत ऋतू |
परमात्मा का स्वरुप और उनकी यादगार : प्रसिद्ध धर्म ग्रंथो , मंदिरों ,
शिवालयों में शिवलिंग की प्रतिमा का ही अधिकाधिक वर्णन है | शिवलिंग की
प्रतिमा प्रायः कालिमा लिए होती है | शिव का अर्थं कल्याणकारी तथा लिंग
का अर्थ चिन्ह होता है | अर्थात कल्याणकारी परमात्मा शिव अज्ञानता की
रात्रि में अवतरित होकर सभी मनुष्यात्माओ
का कल्याण करते है | शिवलिंग पर बनी तीन लाइन तथा बीच में लाल बिंदु का
चिन्ह परमात्मा के दिव्य रूप का प्रतीक है तीन लाइन अर्थात ब्रह द्वारा
स्थापना , विष्णु द्वारा स्रष्टि की पालना तथा शंकर द्वरा महाविनाश को
रेखांकित करती है | इसके बीच में बने रूप अर्थात इन देवो के भी देव
परमात्मा शिव का रूप निराकार ज्योतिबिंदु स्वरुप हैं | इसकी महिमा आदि
काल से लेकर अब तक सर्वाधिक मान्य और पूज्यनीय हैं |
स्वर्णिम प्रभात की आगाज़ की बेला : प्रत्येक मनुष्य को यह समझ लेना
चाहिय की यह वक्त बदलाव का हिन् | पुराणी दुनिया की अंत तथा स्वर्णिम
प्रभात की आगाज़ का शुभ संकेत हैं | अत्याचार के समाप्त होने तथा सदाचार
की स्थापना की पहल का हैं | यह सर्व विदित हैं कि जब किसी भी चीज की अति
हो जाती हैं तो उसका ईश्वरीय अंत ईश्वरीय नियम हैं | आज समाज की और पूरी
दुनिया की स्थिति भी इसे ही संकेत का प्रबल उदाहरण हैं | पोरी मानवता इस
दुनिय्क से मिट चुकी हैं | आणविक हथियारों के ढेर पर सोयी इस दुनिया की
अंतिम श्वांस हैं | प्रकृति के पांचो तत्वों ने भी मनुष्य को सुख देने की
असमर्थता जाहिर कर दी हैं | जिससे ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़,सुखा आदि
परिवर्तन का प्रबल संकेत हैं इस परिवर्तन की अंतिम बेला में स्वयं
परमपिता परमात्मा शिव इस सृष्टि पर अवतरित होकर प्रजापिता ब्रिम्हा के तन
का आधार लेकर नयी दुनिया के पुनर्निमाण का महान कार्य कर रहे हैं | पूरे
भारत तथा विश्व भर में मनाये जाने वाले महाशिवरात्रि के इस महान पर्व पर
गुप्तरूप में महापरिवर्तन का कार्य करा रहे परमपिता परमात्मा शिव को
पहचान ‘शिवरात्रि पर्व’ अपने बुराइयों को स्वाहा कर दैवी गुणधारी बन नयी
दुनिया की स्थापना के महान कार्य सहयोगी बने | यही परमात्मा का सर्व
आत्माओं के प्रति शुभ संकेत हैं |

 

 

बाड़मेरत्न राजयोग के नियमित अभ्यास से ही मन की स्थिरता संभव है। यह बात प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए भगवान भाई ने महावीर नगर स्थित केंद्र में ‘राजयोग का जीवन में महत्व’ विषय पर कहे। उन्होंने कहा कि जीवन में शांति, स्थिरता और खुशी के लिए जीवन में स्थिरता, स्वस्थ जीवन शैली, सकारात्मक चिंतन, साक्षी दृष्टा और आत्मा निर्भयता की आवश्यकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन विकारों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति राजयोग से प्राप्त होती है। राजयोग हमें सकारात्मक चिंतन करने की कला सिखाता है। उन्होंने कहा कि राजयोग से हम अपने शरीर को वश में कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सकारात्मक सोच से ही शरीर की बीमारियों से मुक्ति पाना संभव है। स्थानीय ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की बबीता बहन ने कहा कि राजयोग के निरंतर अभ्यास से हम अपने कर्मेंद्रियों को संयमित कर सकते हैं। 

चिंतन तनाव का कारण : भगवान भाई

भास्कर न्यूज त्न बाड़मेर

दूसरों की कमियों को देखना, उसी के बारे में सोचना यह आदत हानिकारक है। पर चिंतन पतन की ओर ले जाता है। जो पर चिंतन करता है वह जीवन में कभी भी सुखी नहीं रह सकता। यह बात प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंट आबू से आए राजयोगी ब्रह्मा कुमार भगवान भाई ने सेवा केंद्र में कही। स्व चिंतन विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा पर चिंतन करने वाला व दूसरों को देखने वाला हमेशा तनाव में रहता है। पर चिंतन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उन्होंने कहा हम अपनी आंतरिक कमजोरियों की जांच कर उसका परिवर्तन कर सकते हैं। स्व चिंतन ही उन्नति की सीढ़ी है। भगवान भाई ने कहा हमारा जीवन हंस की तरह अंदर-बाहर स्वच्छ रखने की जरूरत है। गुणवान व्यक्ति ही समाज व देश की असली संपत्ति है। उन्होंने कहा सहनशीलता के आचरण से ही व्यक्ति महानता को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मकुमारी राजयोग सेवा केंद्र की बी.के सिंधु बहन ने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान की सकारात्मक बातों का चिंतन करने से हम आंतरिक शक्तियों को जागृत कर अपना आत्मबल, मनोबल बढ़ा सकते हैं। 

 

आंतरिक चेतना के विकास को महत्व देना जरूरी
भास्कर न्यूजत्न बाड़मेर
समाज में फैल रही दुर्भावना और हिंसा, चिंता का कारण बन रही है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक आंतरिक चेतना के विकास को महत्व दिया जाए।

ये विचार प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की भारत में संचालित हो रही स्कूलों में नैतिक शिक्षा का अलख जगाकर इंडिया बुक ऑफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराने वाले ब्रह्मकुमार भगवान भाई ने व्यक्त किए। शुक्रवार को उन्होंने एक कार्यक्रम के तहत राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक स्कूल की छात्राओं को नैतिक शिक्षा का महत्व बताया । राजयोगी भगवान भाई ने कहा कि आज समाज, देश एवं विश्व की क्या स्थिति है। इस बारे में हम अच्छी तरह जानते हैं। केवल भौगोलिक विकास से ही हमारा सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता। नैतिक विकास से समाज और परिवार में मूल्य विकसित होते हैं, वरिष्ठ राजयोगी ने कहा हमारी विरासत हमारे मूल्य है। मूल्य की संस्कृति के कारण आज भारत की पहचान पूरे विश्व में की जाती है। भगवानभाई ने कहा बच्चों को सच्चा और मूल्यनिष्ठ बनाने का ध्यान रखना चाहिए। ब्रह्मकुमारी राजयोग केंद्र की बी.के दमा ने कहा कि जीवन में नैतिक मूल्य एवं चरित्र का आधार आध्यात्मिकता है। कांता चौधरी ने विचार व्यक्त करते हुए कहा वर्तमान में बच्चों को संस्कारित करने के साथ नैतिक शिक्षा जरूरी है।

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नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव स्कूली छात्रों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व बताया जैसलमेर .बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ- साथ नैतिक शिक्षा की भी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा से ही सर्वांगीण विकास संभव है। यह उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रामावि सुथार पाड़ा के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना ही आज की आवश्यकता है। वर्तमान में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है, जो व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। ज्ञान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जो शिक्षा विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाए वही सच्ची शिक्षा है। उन्होंने बताया कि समाज अमूर्त है और वह प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों से ही संचालित होता है। राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि शिक्षा एक ऐसा बीज है जिससे जीवन फलदार वृक्ष बन जाता है। जब तक व्यवहारिक जीवन में सेवाभाव, परोपकार, धैर्य, त्याग, उदारता, नम्रता, सहनशीलता, सत्यता, पवित्रता आदि सद्गुण रूपी फल नहीं आते तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे कल का भावी समाज है। अगर कल के समाज को बेहतर समाज देखना चाहते हो तो वर्तमान के छात्र- छात्राओं को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें संस्कारित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अच्छा या बुरा उसके अंदर के गुणों से बनता है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी केन्द्र के बी.के. देवपुरी ने कहा कि चरित्रवान, गुणवान बच्चे देश व समाज की संपति है। प्रधानाचार्य सुरेशचंद्र पालीवाल ने कहा कि मूल्य शिक्षा से ही व्यक्ति महान बन सकता है। शारीरिक शिक्षक अमृतलाल ने कार्यक्रम का संचालन किया। इसी कड़ी में नैतिक मूल्यों पर आधारित व्याख्यान स्वामी विवेकानंद उच्च माध्यमिक विद्यालय में भी दिया गया।

 

नैतिक शिक्षा से सर्वांगीण विकास संभव
स्कूली छात्रों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व बताया
जैसलमेर .बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए भौतिक शिक्षा के साथ- साथ नैतिक शिक्षा की भी आवश्यकता है। नैतिक शिक्षा से ही सर्वांगीण विकास संभव है। यह उद्गार प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय माउंटआबू से आए राजयोगी भगवान भाई ने रामावि सुथार पाड़ा के विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक शिक्षा का महत्व विषय पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक जगत में विद्यार्थियों के लिए नैतिक मूल्यों को जीवन में धारण करने की प्रेरणा देना ही आज की आवश्यकता है। वर्तमान में नैतिक मूल्यों में गिरावट आई है, जो व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का मूल कारण है। ज्ञान की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जो शिक्षा विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, बंधनों से मुक्ति की ओर ले जाए वही सच्ची शिक्षा है। उन्होंने बताया कि समाज अमूर्त है और वह प्रेम, सद्भावना, भाईचारा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों से ही संचालित होता है।

राजयोगी भगवानभाई ने कहा कि शिक्षा एक ऐसा बीज है जिससे जीवन फलदार वृक्ष बन जाता है। जब तक व्यवहारिक जीवन में सेवाभाव, परोपकार, धैर्य, त्याग, उदारता, नम्रता, सहनशीलता, सत्यता, पवित्रता आदि सद्गुण रूपी फल नहीं आते तब तक हमारी शिक्षा अधूरी है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चे कल का भावी समाज है। अगर कल के समाज को बेहतर समाज देखना चाहते हो तो वर्तमान के छात्र- छात्राओं को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें संस्कारित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति अच्छा या बुरा उसके अंदर के गुणों से बनता है। स्थानीय ब्रह्माकुमारी केन्द्र के बी.के. देवपुरी ने कहा कि चरित्रवान, गुणवान बच्चे देश व समाज की संपति है। प्रधानाचार्य सुरेशचंद्र पालीवाल ने कहा कि मूल्य शिक्षा से ही व्यक्ति महान बन सकता है। शारीरिक शिक्षक अमृतलाल ने कार्यक्रम का संचालन किया। इसी कड़ी में नैतिक मूल्यों पर आधारित व्याख्यान स्वामी विवेकानंद उच्च माध्यमिक विद्यालय में भी दिया गया।

 

 

जैसलमेर. रामावि सुथारपाड़ा में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते प्रजापति ब्रह्माकुमारी के प्रतिनिधि।

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कलियुग अभी बच्चा नहीं है बल्कि बुढ़ा हो गया है इसका विनाश निकट है और शीघ्र ही सतयुग आने वाला है I

 कलियुग अभी बच्चा नहीं है बल्कि बुढ़ा हो गया है

इसका विनाश निकट है  और शीघ्र ही सतयुग आने वाला है I

आज बहुत  से लोग कहते है , ” कलियुग अभी बच्चा है अभी तो इसके लाखो वर्ष और रहते है शस्त्रों के अनुसार अभी तो सृष्टि के महाविनाश में बहुत काल रहता है I  ”

परन्तु अब परमपिता परमात्मा कहते है की अब तो कलियुग बुढ़ा हो चूका है I अब तो सृष्टि के महाविनाश की घडी निकट आ पहुंची है I अब सभी देख भी रहे है की यह मनुष्य सृष्टि काम, क्रोध,लोभ,मोह तथा अहंकार की चिता पर जल रही है I सृष्टि के महाविनाश के लिए एटम  बम, हाइड्रोजन  बम तथा मुसल भी बन चुके है I अत: अब भी यदि कोई कहता है कि महाविनाश दूर है, तो वह घोर अज्ञान में है और कुम्भकर्णी निंद्रा में सोया हुआ है, वह अपना अकल्याण कर रहा है I अब जबकि परमपिता परमात्मा शिव अवतरित होकर ज्ञान अमृत पिला रहे है, तो वे लोग उनसे वंचित है I

आज तो वैज्ञानिक एवं विद्याओं के विशेषज्ञ भी कहते है कि जनसँख्या जिस तीव्र गति से बढ रही है, अन्न की उपज इस अनुपात से नहीं बढ रही है I इसलिए  वे अत्यंत भयंकर अकाल के परिणामस्वरूप महाविनाश कि घोषणा करते है I पुनश्च, वातावरण प्रदुषण तथा पेट्रोल, कोयला इत्यादि शक्ति स्त्रोतों के कुछ वर्षो में ख़त्म हो जाने कि घोषणा भी वैज्ञानिक कर रहे है I अन्य लोग पृथ्वी के ठन्डे होते जाने होने के कारण हिम-पात कि बात बता रहे है I आज केवल रूस और अमेरिका के पास ही लाखो तन बमों जितने आणविक शस्त्र है I इसके अतिरिक्त, आज का जीवन ऐसा विकारी एवं तनावपूर्ण हो गया है कि अभी करोडो वर्ष तक कलियुग को मन्ना तो इन सभी बातो की ओर आंखे मूंदना ही है परन्तु सभी को याद रहे कि परमात्मा अधर्म के महाविनाश से ही देवी  धर्म की पुन: सथापना  भी कराते है I

अत: सभी को मालूम होना चाहिए कि अब परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव सतयुगी पावन एवं देवी सृष्टि कि पुन: स्थापना करा रहे है I वे मनुष्य को देवता अथवा पतितो को पावन बना रहे है I अत: अब उन द्वारा सहज राजयोग तथा ज्ञान- यह अनमोल विद्या सीखकर जीवन को पावन, सतोप्रधन देवी, तथा आन्नदमय बनाने का सर्वोत्तम पुरुषार्थ करना चाहिए जो लोग यह समझ बैठे है कि अभी तो कलियुग में लाखो वर्ष शेष है, वे अपने ही सौभाग्य को लौटा रहे है!

अब कलियुगी सृष्टि अंतिम श्वास ले रही है, यह मृत्यु-शैया पर है यह काम, क्रोध लोभ, मोह और अहंकार रोगों द्वारा पीड़ित है I अत: इस सृष्टि की आयु अरबो वर्ष मानना भूल है I और कलियुग को अब बच्चा मानकर अज्ञान-निंद्रा में सोने वाले लीग “कुम्भकरण” है I  जो मनुष्य इस ईश्वरीय  सन्देश को एक कण से सुनकर दुसरे कण से निकल देते है उन्ही के कान ऐसे कुम्भ के समान है, क्योंकि कुम्भ बुद्धि-हीन होता है I