ब्रह्मा बाप की 18 विशेषतायें (इन विशेषताओं में ब्रह्मा बाप को फालो करो)

1. हर संकल्प वा कर्म में वारी जाने का अभ्यास
जैसे साकार बाप ने अपना सब कुछ विल कर दिया, कभी यह नहीं सोचा कि यह कैसे होगा, क्या होगा…. झाटकू बनें, संकल्प, बोल सब कुछ बाप पर कुर्बान किया, ऐसे फालो फादर करो। मन में जो भी संकल्प उठता है उसमें बाप के प्रति कुर्बान जाने या वारी जाने का रहस्य भरा हुआ हो।
2. त्याग और भाग्य दोनों में नम्बरवन
जैसे ब्रह्मा बाप आदि में स्थापना के कार्य प्रति त्याग और भाग्य दोनों में नम्बरवन निमित्त बने और अब अन्त में भी बच्चों को ऊंचा उठाने के लिए अव्यक्त वतनवासी बने। ऐसे आप बच्चे भी त्याग और भाग्य दोनों में फालो फादर करते हुए स्वयं को और सेवा को सम्पन्न कर बाप समान अव्यक्त वतनवासी बनो। स्नेह स्वरूप को समान स्वरूप में परिवर्तन करो।
3. लौकिकता में भी अलौकिकता का अनुभव
जैसे साकार बाप के कोई भी कर्म से, देखने, उठने, बैठने, चलने और सोने से अलौकिकता दिखाई देती थी। ऐसे आपके हर कर्म में अलौकिकता हो। कोई भी लौकिकता कर्म में वा संस्कारों में न हो। जो सर्वोत्तम पुरुषार्थी हैं उनका सोचना, करना, बोलना तीनों ही एक समान और बाप समान हो। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषार्थी बाप समान वरदाता मूर्त्त बन जाते हैं।
4. सदा लाइट माइट रूप, सिद्धि स्वरूप
जैसे बाप-दादा दोनों लाइट और माइट रूप हैं ऐसे आप बच्चे भी बाप-समान अर्थात् लाइट और माइट स्वरूप बनो। इसके लिए सिर्फ अपने आत्मिक स्वरूप में स्थित रहो तो देह और देह की दुनिया से दूर अपने लाइट के देश और दुनिया में रह लाइट हाउस माइट हाउस स्थिति का अनुभव कर सकेंगे। यही सिद्धि स्वरूप स्थिति है।
5. सदा विश्व कल्याण के संकल्पधारी
जैसे साकार बाप ने रात के नींद का समय अथवा अपने शरीर के रेस्ट का समय भी विश्व कल्याण के कर्तव्य में, सर्व आत्माओं के कल्याण प्रति दिया, ना कि अपने प्रति। वाणी द्वारा भी सदा विश्व कल्याण के संकल्प ही करते थे। ऐसे फालो फादर कर विश्व कल्याण के संकल्पधारी बनो। बाप समान बनना है तो चेक करो कि समय और संकल्प सदा ही विश्व-कल्याण प्रति है? अब मन के विघ्नों को हटाने में ही समय और शक्ति व्यर्थ नहीं गंवाओ।
6. कर्म फल की इच्छा से मुक्त
बाप और दादा दोनों ही कोई भी कर्म के फल की इच्छा नहीं रखते हैं, एक तो निराकार होने के नाते से प्रारब्ध ही नहीं है तो इच्छा भी नहीं हो सकती और साकार में प्रैक्टिकल पार्ट बजाया तो भी हर वचन और कर्म में सदैव पिता की स्मृति होने कारण फल की इच्छा का संकल्प मात्र भी नहीं रहा। ऐसे आप बच्चे भी बाप समान निष्काम वृत्ति वाले बनो, पुरुषार्थ के प्रारब्ध की नॉलेज होते हुए भी उसमें अटैचमेंट ना हो तब यथार्थ पालना दे सकेंगे।
7. निरन्तर योगीपन के लक्षण
जैसे ब्रह्मा बाप के हर संकल्प, हर बोल में नम्रता, निर्माणता और महानता अनुभव होती थी। स्मृति स्वरूप में एक तरफ बेहद का मालिकपन, दूसरी तरफ विश्व के सेवाधारी, एक तरफ अधिकारीपन का नशा, दूसरी तरफ सर्व के प्रति सत्कारी, सर्व आत्माओं के प्रति दाता व वरदाता बनकर रहे। ग्लानि व निन्दा के बोल भी महिमा व गायन योग्य अनुभव किये, ऐसे फालो फादर। बाप समान हर आत्मा को अपने से भी आगे बढ़ाने की शुभ भावना रखते हुए विश्व-कल्याणकारी बनो। यही हैं निरन्तर योगीपन के लक्षण।
8. परिवर्तन शक्ति द्वारा सदा विजयी
जैसे ब्रह्मा बाप ने निंदा को स्तुति में, ग्लानि को गायन में, अपमान को स्व-अभिमान में, अपकार को उपकार में परिवर्तन किया, ऐसे आप भी परिवर्तन शक्ति द्वारा किसी के बोल और भाव को परिवर्तन कर दो तब कहेंगे बाप समान सदा विजयी। सिर्फ स्नेही आत्माओं के प्रति सहयोगी नहीं, होपलेस केस में वा नाउम्मीदंवार को उम्मीदों का सितारा बना दो, तब कहेंगे कमाल।
9. संकल्प वा स्वप्न मात्र भी लगाव मुक्त
जैसे ब्रह्मा बाप पुरानी दुनिया में रहते किसी भी व्यक्ति वा वैभव से संकल्प-मात्र वा स्वप्न-मात्र भी लगावमुक्त रहे, सदा स्वयं को संगमयुगी समझ सारी सृष्टि की आत्माओं को कल्याण और रहम की दृष्टि से देखा। ऐसे फालो फादर। पुराने संस्कार और स्वभाव से उपराम, सदा साक्षीपन की सीट पर स्वयं को सेट हुआ अनुभव करो, यही है लगावमुक्त आत्मा की निशानियां।
10. सर्वगुणों में मास्टर सागर
जैसे ब्रह्मा बाप सर्वगुणों में मास्टर सागर बनें, सर्व शक्तियों का वर्सा प्रैक्टिकल जीवन में अनुभव किया। साथ-साथ आत्मा की जो श्रेष्ठ व महान् स्टेज है-सम्पूर्ण निर्विकारी, सर्वगुण सम्पन्न, सोलह कला सम्पन्न, मर्यादा पुरुषोत्तम और सम्पूर्ण अहिंसक-इस महानता को जीवन में लाया। ऐसे अपने आपको चेक करो कि सर्व गुणों, सर्व कलाओं में कहाँ तक सम्पन्न बने हैं? जैसा समय वैसा स्वरुप बना सकते हैं?
11. निमित्त भाव से नैचुरल सेवाधारी
जैसे ब्रह्मा बाप सदा अपने को निमित्त मात्र अनुभव करते रहे। मैं निमित्त हूँ, सेवाधारी हूँ, यह नेचुरल स्वभाव बनाया। हर बात में अन्य आत्माओं को आगे बढ़ाने के लिए ”पहले आप” का पाठ पक्का किया। पहले मैं नहीं, पहले आप कहने से हर आत्मा के कल्याण के निमित्त बनें। अपने सुख के साधनों का, अपने गुणों का और अपनी प्राप्त हुई सर्वशक्तियों का भी अन्य आत्माओं की उन्नति-अर्थ दान करने वाले महादानी बनें, ऐसे फालो फादर करो तब जिस आत्मा के प्रति जो संकल्प करेंगे या जो बोल बोलेंगे, वह उस आत्मा के प्रति वरदान हो जायेगा।
12. गुणों और शक्तियों के भण्डार
जैसे बापदादा सर्व गुणों और शक्तियों के भण्डार हैं और बच्चों को भी सदा सम्पूर्ण स्वरूप में देखते हैं कि मेरा हर बच्चा बाप समान आनन्द, प्रेम, सुख, शान्ति स्वरूप है। हर एक गुण और शक्ति का भण्डार है। तो आप भी अपने को सदैव ऐसे सम्पन्न समझकर चलो। ऐसी सम्पन्न आत्मा, सदैव स्वयं प्रति शुभ-चिन्तन में रहेगी और अन्य आत्माओं के प्रति शुभ-चिन्तक रहेगी।
13. गम्भीरता और रमणीकता का बैलेन्स
जैसे ब्रह्मा बाप की विशेषता सूरत में सदा गम्भीरता के चिन्ह और मुस्कराहट देखी। अभी-अभी मननचिंतन करने वाला चेहरा और फिर रमणीक अर्थात् मुस्कराता हुआ चेहरा, दोनों ही लक्षण सूरत में देखे, ऐसे आपकी सूरत भी ब्रह्मा बाप के कापी स्वरुप हो। सूरत और सीरत से ब्रह्मा बाप दिखाई दे। जब ब्रह्मा बाप समान सब कापियाँ तैयार हो जायेंगी तब बेहद का बारुद चलेगा, पटाके छूटेंगे और ताजपोशी होगी। तो अब यह डेट फिक्स करो।
14. सदा व्यक्त में रहते अव्यक्त डबल लाइट फरिश्ता
जैसे ब्रह्मा बाप अव्यक्त फरिश्ते के रूप में चारों ओर की सेवा के निमित्त बने हैं। ऐसे बाप समान स्वयं को भी लाईट स्वरूप आत्मा और लाईट के आकारी रूप फरिश्ते स्वरूप में अनुभव करो। स्नेह का सबूत है-समान बनना अर्थात् डबल लाईट बनना। जब ऐसे समान बनेंगे तब सदा समर्थ और विजयी रहेंगे। समान नहीं तो कभी हार, कभी जीत, इसी हलचल में होंगे।
15. सदा परोपकारी और मरजीवे जन्म में बाल ब्रह्मचारी
समीपता का आधार श्रेष्ठता है। श्रेष्ठता का आधार – एक ब्रह्मा बाप समान सदा परोपकारी, दूसरा – मरजीवे जीवन के आदिकाल अर्थात् बाल्यकाल से अब तक सदा ब्रह्मचारी। ब्रह्मचारी जीवन अर्थात् ब्रह्मा समान पवित्र जीवन, जिसको ब्रह्मचारी कहो या ब्रह्माचारी कहो – आदि से अन्त तक अखण्ड, किसी भी प्रकार की पवित्रता अर्थात् स्वच्छता खण्डित न हो तब परम पूज्यनीय बनेंगे, इसे ही फालो फादर कहते हैं।
16. मेहनत के बजाए सदा मुहब्बत में समाये हुए
जैसे ब्रह्मा बाप सदा बालक सो मालिक बन, मेहनत के बजाए मुहब्बत में समाये रहे। कभी मालिकपन की स्टेज से नीचे नहीं आये, ऐसे फालो फादर। यह संगमयुग मुहब्बत का युग, मिलन का युग, शमा और परवाने के समाने का युग है। संगमयुग की प्रालब्ध है – बाप समान स्टेज अर्थात् सम्पन्न स्टेज के तख्तनशीन। यह प्रालब्ध अभी और बहुत समय पानी है। जब कहते हो पा लिया, तो क्या सिर्फ उतरना चढ़ना पा लिया, मेहनत पा लिया या प्रालब्ध को पा लिया? इसलिए अब बाप समान बालक सो मालिक बन, मेहनत को छोड़ मुहब्बत में समाये रहो।
17. व्यक्त से अव्यक्त और अव्यक्त से व्यक्त में आने का अभ्यास
जैसे बाप अव्यक्त होते व्यक्त में प्रवेश हो कार्य करते हैं वैसे बाप समान अर्थात् अव्यक्त स्थिति में रह व्यक्त कर्मेन्द्रियों से कर्म कराना। दृष्टि, वाणी, संकल्प सब बाप समान हो। जितनी-जितनी समीपता उतनी समानता। जैसे नदी सागर में समाकर सागर स्वरूप हो जाती है, ऐसे आप बच्चे साकार होते निराकार स्वरूप के लव में खोये रहो, व्यक्त से अव्यक्त और अव्यक्त से व्यक्त में आने का अभ्यास करो तो आपका स्वरूप भी बाप समान हो जायेगा। जो अनुभव ब्रह्मा का साकार में था, वही बच्चों का भी हो।
18. गुणमूर्त द्वारा श्रेष्ठ वायब्रेशन फैलाने वाले
जैसे ब्रह्मा बाप रात को भी जाग करके वायब्रेशन्स फैलाने की सेवा करते थे। इस बात में जो ओटे सो अर्जुन। दिन में कोई भी सेवा करते शक्तिशाली स्मृति स्वरूप में रहो। सेवा के समय यह ध्यान रखो कि गुण-मूर्त होकर सेवा करनी है तो डबल जमा हो जायेगा। सेवाधारी अर्थात् बाप के कदम के ऊपर कदम रखने वाले, जरा भी आगे पीछे नहीं। चाहे मंसा, चाहे वाचा, चाहे कर्मणा, चाहे सम्पर्क सबमें फुट स्टैप लेने वाले। एकदम पाँव के ऊपर पाँव रखने वाले इसको कहा जाता है फुट स्टैप लेने वाले।