भारत तथा पूरे विश्व में मनाये जाने वाले पर्व, अतीत में हुई ईश्वरीय और
दैवीय महान घटनाओं के यादगार हैं |
भारत तथा पूरे विश्व में मनाये जाने वाले पर्व, अतीत में हुई ईश्वरीय
और दैवीय महान घटनाओं के यादगार हैं |  सभी पर्वो के अपने-अपने महत्त्व
हैं, परन्तु कुछ इसे महापर्व होते हैं जो सृष्टि तथा मानव जीवन को नयी
सुबह और स्वर्णिम अवसर प्रदान करते हैं | इन पर्वो में में महाशिवरात्रि
का पर्व सर्वश्रेष्ठ हैं | यह महापर्व आत्मा और परमात्मा के मिलन का सुखद
संयोग, रात्रि से निकल प्रकाश में जाने तथा अज्ञानता से परिवर्तन होकर
सुजानता की नयी सुबह की दुनिया का आगमन होता हैं | सर्वआत्माओं के
परमपिता परमात्मा शिव की महिमा अपरम्पार हैं | परन्तु मानव जगत में इनके
नामे में रात्रि शब्द जुदा होता हैं | सर्व मनुष्यात्माओं को अज्ञानता की
रात्रि से निकाल सोझ्रे की दुनिया मीन ले जाने वाले पापकटेश्वर,
मुक्तेश्वर, भगवान् शिव के नामे में लग रात्रि का गहरा अर्थ है | वैसे भी
रात्रि का अर्थ केवल २४ घंटे में आने वाली रात्रि ही नहीं बल्कि पूरे
सृष्टि चक्र में आधा कल्प तक आयी अज्ञानता की रात्रि का भी द्योतक हैं |
प्रतिदिन आने वाली रात तो मनुष्य के तन और मन को शांति प्रदान करती हैं,
जिसमे मनुष्य अपनी थकान और भौतिक शारीर को आराम देता हैं | परन्तु मनुष्य
के मन और विचारों में आई अज्ञानता की रात्रि से आत्मा को तभी आराम और सुख
चैन प्राप्त होता हैं, जब मुक्ति दाता परमात्मा की शक्ति से अज्ञान
अन्धकार दूर होता हैं |
देवो के देव महादेव परमात्मा शिव की महिमा कशी से काबा तक विभिन्न रूपों
में गाई और पूजी जाती हैं शिवलिंग के रूप में परात्मा की यादगार पूरे
विश्व में पूजी जाती हैं | अनेक धर्मो और पंथो में भी निराकार परमात्मा
शिव विविध रूपों में स्वीकार्य हैं अज्ञानता की रात्रि ने मनुष्य को
परमात्मा के वास्तविक सच्चाई से दूर कर दिया हैं, इसलिए तो मुक्तिदाता को
अज्ञानता की रात्रि में आने की आवश्यकता होती हैं | वास्तव में अज्ञानता
की रात्रि ऐसी रात्रि होती हैं जिसमे मनुष्य रिश्ते, नाते, अलौकिकता को
भूल जाता हैं, और मानवीय मूल्यों को तिलांजलि दे देता हैं | पूरी दुनिया
में सर्वश्रेष्ठ समझे जाने वाले मनुष्य रूप में मानव नहीं बल्कि दानवी
रूप धारण कर लिया हैं | अज्ञानता की रात्रि की वजह से सर्व मनुष्यों के
अन्दर आसुरीयता घर कर जाती हैं | फिर पूरी दुनिया में अत्याचार,
भ्रष्टाचार, पापाचार, बलात्कार, हिंसा आदि का राज्य हो जाता हैं | दैवी
गुणों की जगह मनुष्य आसुरी वृत्तियों से भरा काम, क्रोध, लोभ, मोह,अंहकार
की सीढियों पर चढ़ भौतिक सत्ता के बल संसार में तबाही मचाना अपना
कर्त्तव्य समझता हैं | यह घोर अज्ञानता की रात्रि का द्योतक नहीं तो और
क्या हैं? यह एसा वक्त हैं जब मनुष्यों की आस्था और विश्वास के सर्वोच्च
स्थान मंदिर, मस्जिद और अन्य पवित्र स्थानों ज्पर अन्याय, हिंसा,
अत्याचार और लूटपाट करने से भी लोग नहीं हिचकते हैं | इस घोर अज्ञानता की
रात्रि में दानवी प्रवृत्तिया मानवता को कुचल देती हैं |
ऐसा चिन्ह पूरी सृष्टि के बदलने का संकेत होता हैं समयानुसार इस सृष्टि
का परिवर्तन होना ईश्वरीय संविधान का अटल सत्य नियम हैं | चारो युगों से
बनी इस सृष्टि का कलियुग, सृष्टि चक्र की अंतिम अवस्था होती हैं | इस घोर
अज्ञानता की रात्रि वाले समय कलियुग के आदि और सतयुग के प्रारंभ में
सृष्टि के जगत नियंता, सर आत्माओं के पिता विश्व कल्याणकारी परमपिता
परमात्मा शिव का अवतरण होता हैं | बूढे नंदी बैल अर्थात मनुष्य के साधारण
तन का आधार लेकर इस पूरी दुनिया का महान परिवर्तन करने का महान कार्य
करते हैं | अज्ञानता की रात्रि को मिटाकर आध्यात्मिक ज्ञान और आध्यात्मिक
शक्ति से स्वर्णिम दुनिया की स्थापना का महान कार्य करते हैं | इसी का
यादगार शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता हैं |
फाल्गुन मास के अंत में मनाये जाने वाला शिवरात्रि का पर्व नयी सुबह लेकर
आता है | इस पर्व का समय के हिसाब से विशलेषण करें तो भारतीय महीने के
अनुसार यह वर्ष का अंतिम महिना होता है इसके बाद प्रकति के तत्व भी अपना
कलेवर बदल कर सुखदायी हो जाते है | जिसे बसंत ऋतू कहते है | यह सभी ऋतुओं
में सबसे सुन्दर और सुखदायी ऋतू होती है | पेड़ पोधे भी अपनी पुरानी
पत्त्तियों को छोड़ नयी पत्तियां धारण कर लेते है | धरती भी अपने गर्भ से
सुगन्धित पुष्पों को जन्म देकर चारो तरफ खुशहाली और सदभावना का संसेश
देती है | भगवान शिव जब अज्ञानता की रात्रि अर्थात कलियुग को बदलकर सतयुग
की महिमा का द्योतक है बसंत ऋतू |
परमात्मा का स्वरुप और उनकी यादगार : प्रसिद्ध धर्म ग्रंथो , मंदिरों ,
शिवालयों में शिवलिंग की प्रतिमा का ही अधिकाधिक वर्णन है | शिवलिंग की
प्रतिमा प्रायः कालिमा लिए होती है | शिव का अर्थं कल्याणकारी तथा लिंग
का अर्थ चिन्ह होता है | अर्थात कल्याणकारी परमात्मा शिव अज्ञानता की
रात्रि में अवतरित होकर सभी मनुष्यात्माओ
का कल्याण करते है | शिवलिंग पर बनी तीन लाइन तथा बीच में लाल बिंदु का
चिन्ह परमात्मा के दिव्य रूप का प्रतीक है तीन लाइन अर्थात ब्रह द्वारा
स्थापना , विष्णु द्वारा स्रष्टि की पालना तथा शंकर द्वरा महाविनाश को
रेखांकित करती है | इसके बीच में बने रूप अर्थात इन देवो के भी देव
परमात्मा शिव का रूप निराकार ज्योतिबिंदु स्वरुप हैं | इसकी महिमा आदि
काल से लेकर अब तक सर्वाधिक मान्य और पूज्यनीय हैं |
स्वर्णिम प्रभात की आगाज़ की बेला : प्रत्येक मनुष्य को यह समझ लेना
चाहिय की यह वक्त बदलाव का हिन् | पुराणी दुनिया की अंत तथा स्वर्णिम
प्रभात की आगाज़ का शुभ संकेत हैं | अत्याचार के समाप्त होने तथा सदाचार
की स्थापना की पहल का हैं | यह सर्व विदित हैं कि जब किसी भी चीज की अति
हो जाती हैं तो उसका ईश्वरीय अंत ईश्वरीय नियम हैं | आज समाज की और पूरी
दुनिया की स्थिति भी इसे ही संकेत का प्रबल उदाहरण हैं | पोरी मानवता इस
दुनिय्क से मिट चुकी हैं | आणविक हथियारों के ढेर पर सोयी इस दुनिया की
अंतिम श्वांस हैं | प्रकृति के पांचो तत्वों ने भी मनुष्य को सुख देने की
असमर्थता जाहिर कर दी हैं | जिससे ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़,सुखा आदि
परिवर्तन का प्रबल संकेत हैं इस परिवर्तन की अंतिम बेला में स्वयं
परमपिता परमात्मा शिव इस सृष्टि पर अवतरित होकर प्रजापिता ब्रिम्हा के तन
का आधार लेकर नयी दुनिया के पुनर्निमाण का महान कार्य कर रहे हैं | पूरे
भारत तथा विश्व भर में मनाये जाने वाले महाशिवरात्रि के इस महान पर्व पर
गुप्तरूप में महापरिवर्तन का कार्य करा रहे परमपिता परमात्मा शिव को
पहचान ‘शिवरात्रि पर्व’ अपने बुराइयों को स्वाहा कर दैवी गुणधारी बन नयी
दुनिया की स्थापना के महान कार्य सहयोगी बने | यही परमात्मा का सर्व
आत्माओं के प्रति शुभ संकेत हैं |